बदलाव !
वर्ष 1978 में बैंक की नौकरी जॉइन की, तब मेरी आयु थी 24, उससे पहले की उम्र वह थी जहाँ हर मनुष्य ही, न सिर्फ मनुष्य बल्कि कोई भी, पुुरुष हो या स्त्री, प्रेम के आकर्षण से बच पाने में असमर्थ होता है। मैं भी इसका कोई अपवाद नहीं था। मैं बचपन से ही सोचा करता था कि यदि किसी से प्रेम है तो विवाह की जरूरत ही क्या हो सकती है? बचपन में, in the teens, प्रेम एक ऐसा रहस्य था, जो मुझे किसी मानव-निर्मित तथाकथित ईश्वर या भगवान से भी कहीं अधिक बड़ा, महान, सुंदर और पवित्र, वास्तविक और मोहक ऐसा एक आकर्षण प्रतीत होता था। और यह भी लगता था कि यदि किसी से प्रेम नहीं है, तो फिर विवाह करने की क्या कोई जरूरत हो सकती है! आज भी मैं बिल्कुल यही सोचता हूँ। तब भी प्रेम, मेरे लिए कोई इस्तेमाल की ऐसी वस्तु नहीं था और आज भी मैं यही सोचता हूँ!
यह परम सौभाग्य कि कोरा कागज कोरा ही रह गया!
यह पोस्ट बिलकुुल अनपेक्षित, अप्रत्याशित, आकस्मिक ही एकाएक यहीं पूरी हो गई!!
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