THREE PARALLELS
अनु-अव-लोकीय
बरमान शब्द "ब्रह्मन्" का अपभ्रंश है। नर्मदा पुराण के अनुसार स्वयंभू ब्रह्मा ने पृथ्वी पर अवतरित होने पर जब चतुर्दिक् देखा और उनके हृदय में जब कौतूहल उत्पन्न हुआ कि उनकी उत्पत्ति जिस कमल से हुई है, और वह कमल भी जिस जल में उत्पन्न हुआ है, वह जल कहाँ से कहाँ तक फैला हुआ है और उससे बाहर जो आकाश क्षितिज से क्षितिज तक घिरा दिखाई देता है, वह कहाँ से कहाँ तक है, और इसी तरह वह अचल पृथ्वी भी, जो कि इस जल में डूबी होने पर भी सर्वत्र ही जिसका आश्रय और अधिष्ठान है, क्या उस पृथ्वी का कहीं कोई प्रारंंभ और / या अन्त है! तब इस कौतूहल से चकित उनकी बुद्धि ठिठककर स्तब्ध हो गई और वे सहस्र वर्षों तक के लिए इस स्तब्धता से एकीभूत होकर अत्यन्त ही उद्विग्न और व्याकुल हो उठे क्योंकि तब उनके पास न तो करने के लिए कोई कार्य था, न ही अतीत या भविष्य नामक कोई ऐसी वस्तु जो उन्हें कुछ करने के लिए अतीत की स्मृति या भविष्य की कल्पना की तरह प्रेरित कर सकती थी। तब अपने केवल अस्तित्व-मात्र होने का भान ही वह एकमात्र वस्तु था जो भान होते हुए भी न तो ज्ञान ही था और न ही अज्ञान था। अस्तित्व का भान और भान का अस्तित्व परस्पर ऐसे अभिन्न थे कि उनके बीच द्वैत नहीं दिखाई देता था। बस, पृथ्वी, जल, वायु और आकाश ही थे जो उन्हें सर्वत्र व्याप्त दिखाई देते थे। सतत, निरंतर ही उद्विग्न और व्याकुल रहने के फलस्वरूप उनमें तप-रूपी अग्नि का आवेश हुआ जिससे उनका भान इन्द्रिय-ज्ञान के रूप में विभक्त और विकसित होने लगा। इस पाँच प्रकार के इन्द्रिय-संवेदनों का रूपांतरण पञ्च तन्मात्राओं में हुआ और तब अस्तित्व के भान और भान के अस्तित्व से युक्त उनकी बुद्धि कला, कल्पना, सौंदर्य और कामना ने एक स्त्री-मूर्ति का रूप लिया और उनके सम्मुख प्रकट हुई। वह स्त्री-मूर्ति भी उन्हें इस प्रकार दिखलाई दी मानो उसका भी उद्भव उनकी ही तरह किसी कमल के पुष्प से हुआ हो।
न तो ब्रह्मा के पास और न ही उस स्त्री-प्रतिमा की कोई भाषा थी, न भावों को अभिव्यक्त करने के लिए



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