February 05, 2011

~~~ रंग ~~~


~~~रंग~~~

by Vinay Vaidya on Saturday, February 5, 2011 at 7:19am

कभी तो रंग दिल के,
उभर आते हैं चेहरे पर,
कभी हम उनको,
लिबासों में छिपा लेते हैं ।
कभी तो रंग लिबासों के भी 
रिसते-रिसते,
दिल तलक,
रूह तलक जाते हैं,
दिल को छलनी,
रूह को घायल,
एहसास को पागल,
या वहशी भी बना देते हैं,
रंग कोई भी हो,
हद तो एक होती है,
रंग सबब न बने रंज का ग़र,
हरेक रंग की ख़ुशबू तो अपनी होती है ।


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4 comments:

  1. रंग न हो 'रंज का' सबब, लेकिन 'रंजक'

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  2. राहुल साहब,
    आप तो जानते ही हैं, कि ’रंज’ उर्दू
    भाषा का शब्द है, जबकि ’रंजक’ शुद्ध
    हिन्दी का ! इसलिये आपका इंगित क्या
    है, समझने में कठिनाई अनुभव हो रही है,
    बहरहाल पोस्ट पढ़ने और टिप्पणी लिखने
    के लिये आभार,
    सादर,

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  3. सच हरेक रंग की अपनी खुशबु होती है ,, सरलता से हर रंग को जीवन के रंग से मिला दिया ,, बहुत सुन्दर विनय जी

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  4. सुनीता,
    आपकी टिप्पणी भी बहुत सार्थक लग रही है ।
    वास्तव में यह मेरी अपनी दृष्टि में मेरी सबसे उत्कृष्ट कविता है,
    जो अनायास ही राजीवजी की कविता को पढ़ते हुए ज़ेहन में उठी ।
    धन्यवाद,
    सादर,

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