आचार्य शङ्कर कृत भवान्याष्टकम्
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नाहं जाने तव महिमानम् ।
पाहि कृपामयि मामज्ञानम्।।
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रोगं शोक पापं तापम्, हर मे भगवति कुमति-कलापम्।
नाहं जाने तव महिमानं, पाहि कृपामयि मामज्ञानम्।।
इस भवान्याष्टकम् नामक स्तोत्र का प्रारंभ इस प्रकार से होता है -
न तातो न माता न बन्धुर्न भ्राता
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी।।
और इसी स्तोत्र में "मामज्ञानम्" के माध्यम से यह प्रार्थना भी की गई है -
हे कृपामयि भगवति! तुम "मुझ अज्ञान" की रक्षा करो।
स्तोत्रकार भगवान् आचार्य शङ्कर यहाँ पर ऐसा नहीं कहते कि मुझ ज्ञानी / अज्ञानी की रक्षा करो।
यहाँ आशय -
मेरे "अज्ञान" की रक्षा करो,
यह भी नहीं है।
इसका तात्पर्य यह है कि "अहंकार" ही ज्ञान और अज्ञान के रूप में "मैं" है, तथा "मैं" ही शिव / भवानी के रूप में परमात्मा भी है।
यह "मैं", जो कि शिव / भवानी कहकर संबोधित किए जानेवाले परमात्मा के स्वरूप से अनभिज्ञ होकर अपने आपको ज्ञान के दंभ से ज्ञानी, और प्रमादवश ही अपने को अज्ञानी भी मान लिया करता है।
जबकि परमात्मा तो दंभ और अज्ञान से सर्वथा रहित है, वही शिव / भवानी है। - दंभरूपी ज्ञान और अज्ञानी होने की कल्पना से रहित वह एवमेव और अद्वितीय, सत् चित् आनन्द रूपी परब्रह्म परमात्मा, वह प्रभु हैं जो -
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।।१४।।
नादत्ते कस्यचित्पापं सुकृतं चैव न विभुः।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।।१५।।
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितं आत्मनः।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत् परम्।।१६।।
(श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय ५)
"मैं करता हूँ" इस प्रकार की कर्तृत्व की मिथ्या भावना से प्रदूषित मन ही स्वयं को मोहित बुद्धि से उत्पन्न अज्ञान से ग्रस्त होकर अपने आपको पुण्य-कर्मों या पाप-कर्मों का करनेवाला मान बैठता है और सुखी दुःखी भी होता है।
उस परमात्मा शिव / भवानी से हमारा वैसा क्या संबंध हो सकता है, जैसा अपने सांसारिक माता, पिता, बन्धु या भाई आदि से हुआ करता है? मोहित बुद्धि के कारण ही, अहंकार ही "मैं" के रूप में ज्ञान और अज्ञान के रूप में बुद्धि को आवरित कर लेता है और इस प्रकार से "मैं" ही ज्ञान / अज्ञान होकर सदैव स्वयं के ज्ञानी होने के दंभ से या अज्ञानी होने की कल्पना से ग्रस्त और त्रस्त हुआ करता है।
जब "मैं" परमात्मा शिव / भवानी की महिमा को और अपनी अल्पज्ञता को जान लेता है तब यही तथाकथित "मैं", ज्ञान और अज्ञान दोनों ही से रहित होकर विशुद्ध ज्ञानमात्र के रूप में अपने स्वरूप से अवगत हो जाता है, और वहीं अवस्थित रहने लगता है।
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