September 14, 2022

परिवर्तन और स्थायित्व

सापेक्ष और निरपेक्ष 

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परिवर्तन और स्थायित्व की पृष्ठभूमि में किसी ऐसे आधार को मानना ही होता है जो अपरिवर्तनशील है। यह पृष्ठभूमि अवश्य ही अप्रकट और अव्यक्त होते हुए भी प्रकट और व्यक्त रूप में सतत परिवर्तनशील आभास की तरह भी विद्यमान है, इस बारे में कोई प्रश्न ही नहीं उठाया जा सकता है। यद्यपि चेतना और संसार सतत ही परिवर्तित हो रहे हैं, और इसीलिए संसार को अनित्य सत्य, तथा संसार की तुलना में चेतना को नित्य सत्य कहना त्रुटिपूर्ण नहीं होगा। संसार (जिसमें एक व्यक्ति विशेष की तरह हमारा शरीर, मन, बुद्धि, इच्छाएँ, भावनाएँ इत्यादि भी हैं) सतत परिवर्तित हो रहा है और उस परिवर्तन का अनुमान समय की मान्यता से किया जाता है। प्रश्न उठता है कि क्या समय की यह मान्यता भी अनुमान मात्र नहीं है? परिवर्तन समय पर निर्भर होता है, या समय परिवर्तन पर? फिर ऐसा भी कहा जाता है कि समय परिवर्तित हो रहा है, या हो गया है! परिवर्तन और समय दोनों ही क्या परस्पर आश्रित कल्पनाएँ ही नहीं हैं? क्या बुद्धि के सक्रिय होने के बाद ही विचार सक्रिय नहीं होता? इस प्रकार से समय और परिवर्तन दोनों को एक ही साथ एक दूसरे से भिन्न और एक दूसरे पर आश्रित भी मान लिया जाना क्या तर्कसम्मत है? किन्तु इस मौलिक प्रश्न पर शायद ही किसी का ध्यान कभी जा पाता है। फिर स्थायित्व और नित्यता क्या है? क्या समय और परिवर्तन, जो कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, की पृष्ठभूमि में विद्यमान उनका संवेदन जिसे होता है, वह चेतना उनकी तुलना में स्थायी सत्य नहीं है? क्या यह चेतना ही नित्यता और निजता भी नहीं है? क्या इस चेतना को जाननेवाला दूसरा, इससे कोई अन्य है? क्या यह चेतना स्वयं ही संसार का और अपनी निजता का प्रमाण नहीं है? चेतना और निजता, चेतना और नित्यता एवं निजता और नित्यता स्वरूपतः एकमेव यथार्थ वास्तविकता नहीं हैं? क्या इस सत्यता को 'मैं', 'तुम', 'यह', 'वह', 'हम', 'आप' 'ये' या 'वे' की तरह से इंगित किया जाना संभव है?

क्या इसके अस्तित्व को अस्वीकार किया जाना संभव है? 

न तो किसी तर्क, न अनुभव से, और न किसी उदाहरण से ऐसा किया जा सकता है। इसे कोई नाम दिया जाना भी इसी तरह से व्यर्थ ही है, क्योंकि इससे उसकी कोई पहचान नहीं बनती और न उसे पहचाना ही जा सकता है। आश्चर्य की बात यह भी है कि यह यद्यपि सभी की और हर किसी की अत्यन्त घनिष्ठ, अन्तरंग और अन्तर्यामी वास्तविकता भी है, फिर भी इसकी ओर कभी किसी का ध्यान भी नहीं जाता। और यह इसलिए भी असंभव है, क्योंकि यह किसी से भिन्न भी नहीं है, सभी में समान रूप से अवस्थित आत्मा ही है! कोई अपने आपको अपने से भिन्न की तरह से जाने, यह कैसे हो सकता है! किन्तु जैसे ही संसार को या संसार की कल्पना को सत्यता प्रदान कर दी जाती है, और उस संसार के अपने आपसे भिन्न होने की तथा अपने आपके उससे भिन्न और पृथक होने कल्पना उठती है, वैसे ही, तत्काल ही सारा प्रपञ्च ठोस सत्य और वास्तविक प्रतीत होने लगता है। तब नित्यता, निजता और चेतना पृष्ठभूमि में विलुप्त हो जाती है और जीवन एक अंतहीन, दुरूह और दुर्गम अरण्य जैसा जान पड़ता है।

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