January 20, 2011

~~स्थितियाँ और मनःस्थितियाँ ~~

~~स्थितियाँ और मनःस्थितियाँ  ~~
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1.यह जो है मन,
कितना अजीब है !
होते हुए !
या न भी होते हुए,
होने- न-होने के बीच,
बाहर और परे, 

अछूता,
जहाँ 'कोई' नहीं होता,
जहाँ,
'अब', 'तब', और 'कब', 'जब'
'अभी', और 'कभी',
नहीं होता  !
लगकर भी नहीं लगता, 

लगाने से कभी लग भी जाता है,
तो जल्दी या फ़िर कभी,

विलग या सुलग जाता है.
सचमुच बहुत अजीब शै है,
यह जो है मन  !

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 2. जी !
आप कहते हैं, 

'जी' मत लगाइए  !
'जी  !' 

कहता हूँ मैं . 
लेकिन क्या 'जी' लगाने की कोशिश करने से,
लग सकता है 'जी' ?



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3.वे दोनों,
खड़े  हैं,
मेरे घर के पीछे,
जहाँ हर सुबह-शाम,
देखता हूँ उन्हें, !
एक-दूसरे के समीप,
एक-दूसरे के साथ,
जैसे दो प्रेमी,
सुबह-शाम,
घूमने के लिए,
हाथों में हाथ थामे,
जा रहे हों, साथ-साथ !
उनका एक ही साझा दिल है,
जिसे आप देख सकते हैं,
अगर आप उन्हें ध्यान से देखें तो .
पर्णवितान के विस्तार में,
आकाश के दिल सा .
और फ़िर उस पर्णवितान के बने दिल के भीतर भी,
पुनः  एक दिल है,
आकाश का बना,
जिसके  पार आप क्षितिज देख सकते हैं !
हर सुबह-शाम,
और कई बार जब भी समय मिलता है,
देखता रहता हूँ मैं,
इस प्रेमी युगल को,
सुनता रहता हूँ,

एक प्रेम-गीत,
सतत !!

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2 comments:

  1. जी, बहुत अच्छा लगा. जी भर गया.

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  2. P.N.Subrahmanian,
    Thanks Sir for the compliments !

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