चिरंतन और सनातन
पुराकथा
सुर और असुर वैसे ही सनातन और चिरंतन हैं जैसे कि प्रकृति और पुरुष। पुरुष और प्रकृति भी एक दूसरे से अभिन्न हैं। एक ही अद्वैत अस्तित्व को बुद्धि के सक्रिय होने पर इन दो प्रकारों में विभाजित कर दिया जाता है। बुद्धि के सक्रिय होने से पहले के अस्तित्व का आगमन जिस स्रोत से होता है और जहाँ पर बुद्धि पुनः विलीन हो जाया करती है उस अनिर्वचनीय संपूर्ण और अखंड को नाद के रूप में प्रणव की तरह से व्यक्त अस्तित्व और ॐ की तरह से अव्यक्त के रूप में जाना जा सकता है। कोई ऋषि ही इन दोनों की अनन्यता और अभिन्नता को इस तरह से जान पाता है। स्वयं ईश्वर भी इस वास्तविकता से शासित है। यद्यपि वह भी इस वास्तविकता को जानता है किन्तु केवल लीला की परंपरा का पालन करने के लिए स्वयं को शासक और शासित की भिन्नता के आभासी विभाजन में निरूपित कर, अव्यक्त से व्यक्त तथा व्यक्त से अव्यक्त में परिवर्तित होता रहता है।
व्यक्त ईश्वर स्वयं भी जीव की कल्पना और बुद्धि द्वारा सृजित उसकी मान्यता और धारणा में बँधा होता है। वे दोनों अन्योन्याश्रित व्यक्त और अव्यक्त वास्तविकता हैं। ॐ से क्रमशः भूः और भुवः की अभिव्यक्ति होने के बाद ही ईश्वर स्व के रूप में व्यक्त रूप ग्रहण करता है। यही स्व अहं की तरह ईश्वर, और अहंकार के रूप में जीव हो जाता है। इस प्रकार से ईश्वर भी केवल लीला के प्रयोजन से तात्कालिक और क्षणिक रूप से अज्ञान से आवरित हो जाया करता है या जीव की दृष्टि में उसे प्रतीत होता है। वही ईश्वर शासक के रूप में प्रभु और शासित के रूप में विभु होता है। जीव जब इस काल्पनिक या वास्तविक ईश्वर के प्रति शरणागत हो जाता है या स्वयं अपने और उसमें विद्यमान अन्तर्निहित आत्मा की जिज्ञासा कर उस वास्तविकता को जान लेता है तो जीवरूपी अहंकार तथा अहं रूपी ईश्वर के बीच का काल्पनिक विभाजन विलीन हो जाता है और एक ही अद्वैत परमार्थ द्योतित हो जाता है। यह नित अभिनव, नित पुरातन और नित चिरंतन भी है।
सुर तथा असुर के रूप में प्रकृति की दो अभिव्यक्तियों की संपत्ति को ही क्रमशः दैवी और आसुरी संपत्ति कहा जाता है। आसुरी संपत्ति तो जीव के लिए बंधन हो जाया करती है जबकि दैवी उसे बंधन से मुक्ति प्राप्त करने के लिए सहायक होती है।
इसी प्रकार सुरों और असुरों की प्रवृत्तियाँ भी एक दूसरे से भिन्न प्रकार की होती हैं।
प्रकृति और पुरुष के रूप में उनकी सकलता को व्यक्त ब्रह्म कहा जाता है, और उन दोनों के व्यक्त और अव्यक्त रूप की अनन्यता, अभिन्नता को स्वरूप या परब्रह्म कहा जाता है।
इसलिए ईश्वर और जीव परब्रह्म परमात्मा के ही क्रमशः बड़े और छोटे पुत्र, अर्थात् एक दूसरे के क्रमशः वैसे ही ज्येष्ठ और कनिष्ठ भ्राता हैं, जैसे राम और लक्ष्मण। या उन्हें कृष्ण और बलराम की तरह भी देखा जा सकता है जहाँ ईश्वर कनिष्ठ भ्राता और जीव ज्येष्ठ भ्राता है। क्योंकि दोनों ही एक दूसरे पर आश्रित यथार्थ हैं।
दिति और अदिति के पुत्रों अर्थात् देवताओं और दैत्यों के बीच उनकी प्रवृत्ति और संपत्ति के आधार पर मतभेद थे। देवता भी दैत्यों की ही तरह ईर्ष्या, भय, लोभ, राग तथा द्वेष से युक्त थे। बृहस्पति देवताओं के पुरोहित थे जबकि आचार्य भृगु दैत्यों के।
देवता और दैत्य दोनों ही परम पिता परमेश्वर अर्थात् उनके ईश्वर की पूजा-आराधना शिव, हर या रुद्र के रूप में करते थे जबकि देवता हरि के रूप में विष्णु की पूजा-आराधना भी किया करते थे। जबकि देवता होने से ब्रह्मा का कार्य सृष्टि करने तक था, और विष्णु का कार्य सृष्टि की रक्षा तथा परिपालन करने तक सीमित था और शिव का कार्य सृष्टि का संहार (विनाश नहीं) करना था। क्योंकि जैसा गीता अध्याय २ में कहा गया है -
अविनाशी तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति।।१७।।
देवताओं और दैत्यों के बीच का यह संघर्ष भी उतना ही और वैसा ही शाश्वत, पुरातन, सनातन और चिरंतन है, जैसा कि दैवी और आसुरी प्रवृत्तियों और संपत्तियों के बीच का संघर्ष है।
विष्णु इसलिए देवताओं के पक्ष में कार्य करते हैं, जबकि शिव देवताओं और दैत्यों के बीच भेद नहीं करते, जो भी कोई उनकी पूजा आराधना कर उन्हें प्रसन्न कर लेता है उसे वरदान देकर उसकी कामनाएँ पूर्ण कर देते हैं।
देवता स्वर्गलोक में रहते हुए आमोद प्रमोद करते रहते हैं जबकि जीव मृत्यु-लोक में रहते हैं, और अपने शुभ तथा अशुभ कर्मों के अनुसार मृत्यु होने से पहले और बाद में भी स्वर्ग और नरक में रहा करते हैं। देवता भी पुण्य क्षीण हो जाने पर मृत्यु-लोक में लौट आते हैं और कर्मशृँखला में बँधे नए नए कर्मों के माध्यम से सदैव सुख दुःख पाते रहते हैं। इनसे भिन्न एक वर्ग है ऋषियों का जो नित्य ही परमेश्वर या परब्रह्म की प्राप्ति, भवसागर से मुक्ति की कामना से या सत्य की प्राप्ति के लिए प्रयासरत रहते हैं। वेद और पुराण का इन ऋषियों के द्वारा अध्ययन किया जाता है। वेद ईश्वरीय विधान के प्रक्रिया ग्रन्थ हैं, पुराण प्रकरण और कथा की शैली में धर्म और अध्यात्म का वर्णन और विवेचना करते हैं।
भृगु ऐसे ही ऋषि हैं जो सप्तर्षियों में से एक हैं, जबकि मनु उन मनुष्यों का वर्ग है जो भिन्न भिन्न समय पर जन्म लेते हैं और धर्म को परिभाषित करते हुए मनुष्यों के लिए उसकी शिक्षा देते हैं। इस प्रकार के चौदह मनु हैं जिनका वर्णन शास्त्रों में पाया जाता है। मनु के रूप में जन्म लेने वाले मनुष्यों के काल को मन्वन्तर कहा जाता है। इनमें से एक हैं सावर्णि मनु Emmanuel, जो छाया के सूर्य से उत्पन्न पुत्र हैं जबकि वैवस्वत्, विवस्वान् सूर्य के संज्ञा से उत्पन्न पुत्र हैं।
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।।१।।
(श्रीमद्भग्वद्गीता अध्याय४)
भृगु के ही वंश में आचार्य शुक्र का जन्म हुआ और उन्हें दैत्यों ने अपने पुरोहित के रूप में स्वीकार किया क्योंकि बृहस्पति या कि दूसरे ब्राह्मण ने विष्णु के अनुयायी होने के कारण दैत्यों का पुरोहित होना स्वीकार नहीं किया।
इसी प्रकार शिव के उपासक जाबाल / जाबालि ऋषि ने देवताओं और दैत्यों में भेद न करते हुए ईश्वर या परमेश्वर की तत्व की प्राप्ति करने हेतु शिव की उपासना करने की शिक्षा दी।
इसलिए केवल जाबाल ऋषि Gabriel / जिबरील ही एकमात्र वह ऋषि थे जो ऋषि शौनक और ऋषि अंगिरा Angel की परंपरा में थे, जिनका तीनों ही अब्राहमिक परंपराओं में उल्लेख पाया जाता है जिन्होंने उन तीनों ही परंपराओं के प्रविदों / Prophets को मार्गदर्शन दिया। देवताओं और दैत्यों के युद्ध के समय एक बार देवताओं से अपनी रक्षा करने के लिए दैत्यों ने शुक्राचार्य अर्थात् भृगु ऋषि के आश्रम में शरण ली। भृगु ऋषि उस समय किसी कार्य से आश्रम से बाहर कहीं गए हुए थे तो भृगु ऋषि की पत्नी ने उन्हें शरण दी। जब त्रषि की पत्नी का विष्णु से सामना हुआ तो विष्णु ने अपने चक्र से उसका वध कर दिया। जब ऋषि लौटे और उन्हें इस वृत्तान्त का पता चला तो उन्होंने विष्णु को शाप दिया कि त्रेतायुग में उन्हें भी मनुष्य की तरह मृत्यलोक में अवतरित होना या जन्म लेना होगा। इसलिए श्रीराम के रूप में राजा दशरथ के पुत्र के रूप में अयोध्या में विष्णु का जन्म हुआ।
परब्रह्म-परमात्मा, ईश्वर, ब्रह्म, अब्रह्म और जीव के बीच का भेद इस पुराकथा से समझा जा सकता है।
इजिप्ट से मनुष्यों के जिस कबीले को फराओं के द्वारा निष्कासित किया गया था उस कबीले ने दो ही पाप किए थे। पहला पाप था गोवध और दूसरा था मूर्तिपूजा और बहुदेवतावाद की निन्दा करना।
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