वनदुर्गा उपनिषद्
बचपन में गर्मियों की दो माह की लंबी छुट्टियों के दिनों से पहले 30 अप्रैल के दिन स्कूल का अंतिम दिन होता था, और इसी दिन वार्षिक परीक्षा का परिणाम घोषित होता था। सभी बच्चों पर फेल हो जाने का डर इस तरह हावी होता था कि 29 अप्रैल का दिन कटना मुश्किल हो जाता था। उस दिन हम बच्चे एक पार्टी रखते थे और बच्चों के खेल खेलते थे। हर किसी को पुरस्कार दिया जाता था, पहला सबसे बड़ा पुरस्कार खेल में हारनेवाले को दिया जाता था ताकि वह समझ सके कि जीवन में भाग्य और कर्म दोनों का समान महत्व है और न तो हार से निराश या दुःखी होना चाहिए और न जीत होने पर खुश होकर बहुत गर्व करना।
खेल भी कौन से? लूडो, चाइनीज़ चेकर्स जैसे घरेलू खेल। वैसे चाइनीज़ चेकर्स से बेहतर खेल होता था - अष्टा चंगा पे। ताश के खेल भी जैसे कि ट्वेंटी नाइन, गुलाम-चोर, झब्बू, खेले जाते थे। लड़कियाँ "पाचे" खेला करती थीं। "पाचे" वैसे हिन्दी / मराठी में प्रयुक्त यह शब्द संस्कृत "पांशु" का वैसा ही अपभ्रंश है, जैसा कि हिन्दी में प्रचलित "पाँसे" शब्द - कहते हैं न,
"पाँसा पलट गया!"
ऐसा ही ताश के पत्तों का एक खेल होता था -
NOT AT HOME!
वर्ष 2010 के आसपास मुझे कहीं से मुझे एक बार एक गिफ्ट मिला था वनदुर्गा उपनिषद्। साथ ही यह दायित्व भी, कि मैं उसके संस्कृत टेक्स्ट को शुद्ध टाइपसेट कर वह टेक्स्ट वापस भेज दूँ। यहाँ से एक नया खेल शुरू हुआ। उस संस्कृत टेक्स्ट की कुछ पंक्तियाँ पढ़ते ही एक पंक्ति पर दृष्टि पड़ते ही मैं अटक गया और मेरी बुद्धि में यह कौंध गया कि यहाँ एक "Lock" है। सामान्यतया संस्कृत के सभी धार्मिक और आध्यात्मिक ग्रन्थों में ऐसे कुछ अदृश्य "लॉक" इन-बिल्ट होते हैं ताकि कहीं किसी अनधिकारी / अपात्र को वह ज्ञान उपलब्ध न हो। ऐसा इसलिए भी आवश्यक है ताकि अनजाने में भी किसी का भी अहित न हो।
इस घटना के बाद से संस्कृत ग्रन्थों के अध्ययन करने के मेरे तरीके में एक आमूल-चूल और क्रांतिकारी परिवर्तन घटित हो गया।
मुझे यह भी स्पष्ट हुआ कि संस्कृत के किसी भी धार्मिक और आध्यात्मिक ग्रन्थों का किसी भी भाषा में अनुवाद किया जा सकना असंभव है। हाँ कोई इनका कोई मर्मज्ञ ही संभवतः इनका भाष्य शायद लिख सकता है।
अनुवाद / translation
और
भाष्य / Commentary
के माध्यम से भी उस ग्रन्थ के मर्म की ओर केवल संकेत ही किया जा सकता है। उस रहस्य / मर्म का आविष्कार तो केवल कोई अधिकारी / पात्र ही कर सकता है।
फिर भी एक उदाहरण से इसे इस तरह से समझाया और समझा जा सकता है -
अंग्रेजी भाषा का एक शब्द है :
viscosity / viscose.
यह शब्द संस्कृत शब्द
विष्कोश, विष-कोश या विष-कोष
का अपभ्रंश या व्युत्पन्न हो सकता है। इसका अर्थ है - श्यानता / श्याम जो उर्दू में शाम के रूप में प्रचलित हो गया। श्याम का दूसरा अर्थ है कृष्ण अर्थात् काला- काला अर्थात् गूढ, गहन, अदृश्य, रहस्यमय।
फिर भी वह दिखाई तो देता ही है!
ईश्वर ऐसा ही एक, अनेक या एकानेक से परे मर्म, गूढ, गहन, अदृश्य, रहस्य है। क्योंकि साँख्य दर्शन के अनुसार एक और अनेक "गुण" हैं और पातञ्जल योगदर्शन के अनुसार गुणकर्मसमष्टि का प्रतिप्रसव कैवल्यम् ।
ताण्डवराया स्वामी ने शायद इसीलिए
कैवल्य-नवनीत
नामक तमिऴ ग्रन्थ की रचना की होगी।
प्रसंगवश -
जब भी,
रहसि स्थितः, रहिं, जैसा, अरबी भाषा का -
रहीम
शब्द मेरी आँखों के सामने आता है, सबसे पहले मेरे मन में इसका यही अर्थ द्योतित होता है। मैं यहीं रुक जाता हूँ, क्योंकि मैं समझता हूँ, कि मैं अरबी और हिब्रू भाषा के ग्रन्थों को पढ़ने के लिए अनधिकारी / अपात्र भी हूँ, क्योंकि ऐसा करना न सिर्फ अनावश्यक और अवाँछनीय बल्कि शायद विनाशकारी भी हो सकता है। और मेरे द्वारा ऐसा किया जाना मेरे
कार्यक्षेत्र, अधिकार क्षेत्र और योग्यता क्षेत्र
की मर्यादा का उल्लंघन और मेरे सामर्थ्य से बाहर की वस्तु है।
और तब मैं
Not At Home / Lock At Home
कहकर चुप हो जाता हूँ।
और परमात्मा तो तो वह मर्म है जो ईश्वर से भी अधिक गूढ, गहन, अदृश्य, रहस्यपूर्ण है। फिर भी वह अदृश्य की तरह दिखाई तो देता ही है! और कितना भी धुँधला क्यों न हो जाए, प्रेम की तरह अनुभवगम्य भी तो होता ही है न!
याद आती हैं गजानन माधव मुक्तिबोध की रचनाएं -
ब्रह्मराक्षस का शिष्य, विपात्र और
संभवतः उनकी ही और एक रचना यह भी है -
चाँद का मुँह टेढ़ा है।
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