December 25, 2025

THE CONSCIENCE

The Consciousness of Science.

विवेेक, चेतना और विचार

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छिन्नमस्ता और रक्तबीज

छिन्नमस्ता चेतना, रक्तबीज अहंकार,

सृष्टि का सतत उपक्रम,

काल से अछूता!

चेतना वह पृष्ठभूमि,

भविता पञ्चभूत,

अग्नि, वायु, नीर, नभ,

सबमें ही ओतप्रोत,

सबमें ही अभिव्यक्त!

संकल्प वह अहंकार,

रक्तबीज वह विचार,

स्वयंभू अस्तित्व वह,

राहु-केतु में विभक्त।

उसके वे असंख्य बीज,

उसके वे असंख्य पुत्र,

भूमि पर गिरते ही,

चेतना के स्पर्श से,

हो जाते प्राणयुक्त।

रक्तपिपासु वे सभी,

परस्पर वे युद्धरत,

हर कोई स्वतंत्र एक,

यद्यपि अनंत अनेक!

चेतना तब भूमिमाता,

महाशक्ति कालरात्रि,

धरती रूप काली का,

हाथ में लिए खप्पर,

हाथ में लिए खंजर!

करती वध रक्तबीज की,

हर एक संतान का,

हर एक बीज का!

रक्तबीज के रक्त के,

हर एक रक्तबिंदु को,

खप्पर पर समेट लेती,

भूमि पर न गिरने देती,

करती रहती रक्तप्राशन,

रक्तबीज के अवसान तक!

और भूल जाती है,

समक्ष खड़े रुद्र को भी!

गिराकर उन्हें धरा पर,

करती है अट्टहास!

छिन्नमस्ता चेतना,

वही शिव, वही शिवा,

और वे एकानेक

रक्तबीज अहंकार!!

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December 24, 2025

KAARYA-BRAHMA.

कार्य-ब्रह्म

जीवात्मा और ब्रह्म / परब्रह्म

जीव का व्यक्तिगत जीवन क्या है?

गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं -

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप।।

हे अर्जुन!

यद्यपि मेरे और तुम्हारे द्वारा पहले भी बहुत से जन्म व्यतीत किए गए हैं, किन्तु उन सभी जन्मों को केेवल मैं जानता हूँ, तुम नहीं।

दूसरी ओर गीता में ही यह भी कहा गया है -

न जायते म्रियते वा कदाचन् 

नायं भूत्वाऽभविता च भूयः।

अजो नित्यो शाश्वतोऽप्रमेयः

न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।

इस प्रकार मनुष्य या किसी भी जीव के समय समय पर अनेक जन्म और मृत्यु होती हैं। स्पष्ट है कि यहाँ "जीव" शब्द का आशय वह व्यक्तिरूपी वह विशेष "चेतना" है, जिसे जन्म और मृत्यु की इस घटना के घटित होने का वैसा ही भान होता है जैसा अपने द्वारा पहने हुए वस्त्रों को उतारकर फिर दूसरे किन्हीं वस्त्रों को धारण करने का भान हमें होता है गीता में इस तथ्य का वर्णन इस प्रकार से किया गया है -

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय

नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।

तथा शरीराणि विहाय अन्यान्

अन्यान् याति नवानि देही।।

तात्पर्य यह कि "जीव" वह "चेतन" तत्व है जो किसी जीवित शरीर में व्यक्तिरूप में अपनी पहचान स्वयं ही होता है। यह "पहचान" एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर की "पहचान" में बदल जाती है, किन्तु इन दोनों में अपनी "निजता" का भान यथावत अपरिवर्तित रहता है। यह अपरिवर्तित रहनेवाला तत्व वह "आत्मा" है, जिसका न तो जन्म हो सकता है और न ही मृत्यु हो सकती है। बौद्ध दर्शन में शायद इसलिए ब्रह्म और ईश्वर के अस्तित्व के) बारे में कुछ नहीं कहा गया, और इसलिए संंभवतः उसे नास्तिक धर्म भी समझा जाने लगा। जैैन धर्म में भी ऐसी ही कुुछ स्थिति देखी जा सकती है। किन्तु "आत्मा" के (अस्तित्व के) और आत्म-ज्ञान के बारे में अपरोक्षतः या परोक्ष रूप से अवश्य ही बहुत कुछ कहा गया है।

जीव, जगत और संसार (अर्थात् कार्य ब्रह्म) की नित्यता  इसीलिए एक अकाट्य, यद्यपि औपचारिक सत्य है, यह तो मानना ही होगा।

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December 23, 2025

THIS IS REALITY.

आभास, कल्पना, विचार, समय और मैं

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आभास पुरुष है, कल्पना स्त्री है।

विचार और भावना उनकी संतान।

मैं सत्य, और समय मेरा विस्तार है।

मैं पुरुष, और प्रकृति स्त्री है।

शरीर आभास है और मन कल्पना है।

दोनों साकार हैं।

दोनों निराकार हैं।

स्थान और समय आभास हैं।

विस्तार और संकोच, मन और कल्पना हैं। 

मैं और मेरा समय मेरा संसार है।

अतीत और भविष्य,

आभास और कल्पना का सातत्य है।

सातत्य आभास और कल्पना है।

मैं अखंडित और वास्तविक वर्तमान।

वर्तमान की तरह पुरुष, चिति / चेतना की तरह स्त्री।

मैं नित्य, आभास और कल्पना अनित्य।

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December 14, 2025

TUMOR.

रसौली

दर्द एक गाँठ होता है प्याज की तरह,

छीलते जाओ, आँसू भी बहाते जाओ,

और आखिर को कुछ हाथ नहीं आना है,

हर किसी का यहाँ यही तो अफ़साना है!

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December 12, 2025

2+1/2 Decade.

हातिमताई और ढ़ाई दशक

ईस्वी सन् 2000 से वैताल पच्चीसी प्रारंभ हुई।

ईस्वी सन् 2025 का अंत होते होते यह कथा संपन्न हो रही है। पृृथ्वी पर दो हजार वर्षों का एक युग समाप्ति के समीप है। वैसे भी "युज् युज्यते" धातु से उत्पन्न युग का अर्थ है दो वस्तुओं का आपस में जुड़ना। और टूटना भी। आनेवाले अगले 21 दिनों अर्थात तीन सप्ताहों में यह बदलाव पूरा होने वाला है, हो जाना है।

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