February 23, 2009

उन दिनों / 4.

सामान्यतः मनुष्य अपने बोध को 'मेरी चेतना' कहता है । यह त्रुटि का प्रारंभ है । विचारणीय यह है कि जैसे हम अन्य वस्तुओं को 'मेरा' या 'अपना' कहते हैं, क्या उसी प्रकार से चेतना (consciousness) को 'मेरा' कहना तर्कसंगत है ? यदि आप चेतना शब्द को विचार, भावनाएँ, स्मृति, बुद्धि, संस्कार, आदि के लिए इस्तेमाल करते हैं, तो यह प्रश्न उठाता है कि उनसे पृथक् कोई 'मैं' यदि है, तो उसका स्वरुप क्या होगा ? अर्थात् उसका रंग-रूप, ताना-बाना, आकृति, आदि क्या है ? क्या 'जानना' ही 'मैं' नहीं है ?
लेकिन इस प्रश्न पर हम कभी आते ही नहीं । यदि विचार, मन, बुद्धि, भावनाओं, संस्कारों, स्मृतियों, आदि को 'अपना' या 'मेरा' कहनेवाली किसी वस्तु, या तत्व का अस्तित्त्व है, तो 'वह' किस प्रकार का अस्तित्त्व है ? ऐसी कोई वस्तु यदि सचमुच है, जैसे विचार, मन, बुद्धि, भावनाएँ, और स्मृति आदि हैं, यदि उसी प्रकार से इस 'मैं' का भी अस्तित्त्व है, तो वह वस्तु (मैं) क्या है ? मुझे नहीं मालूम कि मैं जो कह रहा हूँ, (या जो कहा जा रहा है !) उसका आशय आप तक सम्प्रेषित हो रहा है या नहीं । और यदि आप तक यह बात पहुँच रही है, अर्थात् यदि आप उसे ग्रहण कर पा रहे हैं, तो यह सवाल भी सरलता से आपके समक्ष भी वैसे ही आ खड़ा होगा, और आप इस प्रश्न की तीव्रता से चौंक जायेंगे । आपके भीतर यह सवाल भी उठेगा कि इस ओर आपका ध्यान पहले कभी क्यों नहीं गया ! और यदि मैं जो कहने का प्रयास कर रहा हूँ, यदि वह आप तक पहुँच सका है, तो आपको मेरी बात कोरा बौद्धिक प्रलाप कदापि नहीं लगेगी । वरना तो आप ज़रूर यही सोच रहे होंगे कि यह सब कहीं थोथा शब्द-जाल तो नहीं है !
तो इस ओर ध्यान दिया जाना ज़रूरी है कि यह 'मैं' नामक वस्तु ( जो एक अमूर्त्त तत्त्व तो अवश्य ही है) वास्तव में किस प्रकार की बनावट वाली वस्तु है ? (यदि थोड़ा सा मज़ाक कर लें तो ) यह प्रश्न भी गंभीरता से किया जा सकता है, कि कहीं यह कोई बनावटी वस्तु तो नहीं है ? और यदि सचमुच यह एक अमूर्त्त बनावटी वस्तु है, तो भी इतनी ताकत से उभरकर हम पर हावी क्यों हो जाती है ?
इसे ही अब हम दूसरे-तीसरे ढंग से भी देखेंगे । दूसरा ढंग यह है कि क्या यह 'मैं' एक भावना, विचार, अनुमान, या निष्कर्ष है ?
हमारे हृदय, और मस्तिष्क की क्षमताओं , -जैसे कि बुद्धि, अनुमान,स्मृति, और विचार की क्रिया-प्रणाली किसी कम्प्यूटर की तरह से अपना काम स्वाभाविक रीति से करती है, लेकिन इनसे परे की कुछ चीज़ें जैसे भय, इच्छा, इस स्वाभाविक क्षमता (या इन स्वाभाविक क्षमताओं ) को भिन्न भिन्न प्रकार से प्रभावित करते हैं । शारीरिक सुरक्षा के लिए भय, अथवा इच्छा का होना तो प्राकृतिक व्यवस्था का ही हिस्सा है, जैसे भूख लगने पर भोजन पाने का प्रयास होना, ठण्ड लगने पर उससे बचने की कोशिश, शरीर को क्षति होने की संभावना दिखलाई देने पर उस संभावना को समाप्त करने का प्रयास आदि । उसी तरह से काम-वृत्ति भी शरीर की क्रिया-प्रणाली का एक अंग है ।
सवाल यह है कि इस सारे क्रम में 'मैं' नामक उस बनावटी, वास्तविक, काल्पनिक, या अनुमानित वस्तु की , उस अमूर्त्त तत्त्व की क्या भूमिका है ? क्या उस अमूर्त्त (भाववाचक) तत्त्व का शरीर में कोई विशेष स्थान या केन्द्र है ? क्या उसका शरीरगत कोई ऐसा विशेष केन्द्र है, जहाँ से वह तत्त्व अस्तित्त्व पाटा हो ? इसमें संदेह नहीं, कि यह सारा विमर्श बुद्धि, विचार, तर्क, स्मृति, और 'अभिव्यक्ति' नामक शक्तियों के प्रयोग से सम्भव हो रहा है ।

3 comments:

  1. main,ek ahnkar hai. narayan narayan

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  2. बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

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