July 06, 2013

|| तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ||

|| तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ||
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(© Vinay Vaidya, 
vinayvaidya111@gmail.com, Ujjain / 06-06-2013.)
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|| तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ||
- तत्-मे मनः शिवसङ्कल्पम् अस्तु ।
सँस्कृत अत्यन्त वैज्ञानिक (पूर्णतः विधिसंगत) भाषा है । जहाँ अन्य भाषाओं का व्याकरण भाषा के प्रचलन से ’तय’(devised / invented) किया गया है, संस्कृत का व्याकरण व्यवहार में प्रयुक्त शब्दों की व्युत्पत्ति और उनके पारस्परिक संबंधों से ’आविष्कृत’ (discovered) किया  गया है । इसलिए संस्कृत का व्याकरण ’शब्द’ और अर्थ के अस्तित्त्व का संबंध ’नित्य’ होने को सत्य मानकर चलता है । इसका  एक तात्पर्य यह हुआ कि हर शब्द का किसी भी दूसरे शब्द के संदर्भ में एक ही सुनिश्चित अर्थ है । क्योंकि सृष्टि का ज्ञान सृष्टि होने के बाद उत्पन्न हुआ हो, यह संभव नहीं है । इसलिए जब हम एक शब्द भी प्रयोग करते हैं तो उसके अनंत संभावित अर्थों का जगत् हमें उपलब्ध हो जाता है ।
तत् - वह, ब्रह्म, विस्तारयुक्त, ... मे - मेरे लिए (चतुर्थी, एकवचन), मेरा (षष्ठी एकवचन),  मनः - ’मन’ / चित्त / हृदय / बुद्धि, शिव - 'शिवसहस्रनाम' एक  सीमा तक इस शब्द का तात्पर्य बतलाता है । संकल्पम् - ’सं’ उपसर्ग सहित ’कल्’ / ’क्लृप्’ धातु से व्युत्पन्न, सम्यक् भावना, (auspicious intentions, aspirations) , अस्तु -’अस्’ धातु, (’अदादिगण, -’होने के अर्थ में, ’लोट्’ लकार, प्रथम पुरुष एकवचन, (third person, singular case). 
इस विवेचना से उक्त मन्त्र का सामान्य भाव क्या है यह समझा जा सकता है । 
संक्षेप में मैंने संस्कृत की सामर्थ्य और समृद्धि को इंगित किया । जिसे रुचि हो वह व्युत्पत्ति और ’शब्द-सिद्धि’ की सहायता से इसे बहुत दूर तक ले जा सकता है, जो कोरा शब्द चातुर्य नहीं होगा, बल्कि चकित ही कर देगा ।
'omnibus' की ’शब्द-सिद्धि’ अर्थात्  'etymology'  देखें, तो ’ओम्नि’ ’ओम्’ का सप्तमी एकवचन रूप (locative, singular case) हुआ । समझने के लिए, जैसे ’व्योम्’ का व्योम्नि होता है ।
’वस्’- से 'bus'  की व्युत्पत्ति दृष्टव्य है । इस प्रकार हम अंग्रेज़ी के अधिकाँश शब्दों का संस्कृत मूल खोज सकते हैं । यह सही है कि यह बहुत हद तक एक श्रमसाध्य कार्य होगा लेकिन उसका पुरस्कार (reward) इतना अद्भुत् होगा कि अंततः हमें अत्यन्त प्रसन्नता होगी । और वह पूरे विश्व के लिए कल्याणप्रद, मंगल, ’शिव’ होगा । 
अपनी बात स्पष्ट करने के लिए मैं यहाँ दो उदाहरण और देना चाहूँगा 
पहला शब्द है इटॉयमॉलोजी (Etymology) - व्युत्पत्ति , निरुक्ति । इसे ’विग्रह’ करें तो इस प्रकार से होगा - इति + इयम् / अयम् + अव + लग् + ईय । यह उदाहरण मुझे अत्यन्त प्रिय है, क्योंकि इसमें उपसर्ग (prefix), प्रत्यय (suffix) तथा मध्यसर्ग  (infix) सरलता से दिखाई देते हैं । इति क्रिया-विशेषण है, इयम् / अयम् ’इदम्’ के एकवचन पुंलिंग तथा स्त्रीलिंग कर्त्तापद (nominative, masculine feminine third person singular case) हैं । ’अव’ उपसर्ग है, यहाँ मध्यसर्ग / infix है । लग् धातुरूप है जिसे लगने / जुड़ने के, संलग्न / विलग्न के अर्थ में   प्रयोग किया जाता है । ’लॉग्-ऑन्’ उसी से निकला है ।’ईय’, ’ईयस्’ / ’ईयसुन्’ प्रत्यय है । इन सारे उपसर्गों, मध्यसर्गों, प्रत्ययों धातुरूपों से  अंग्रेजी के अधिकाँश शब्दों की व्युत्पत्ति देखी / समझी / समझाई जा सकती है ।  हाँ, भाषाशास्त्र के अन्तर्गत होनेवाले विभिन्न प्रचलनमूलक ’रूपिम’ तथा ’स्वनिम’ प्रभावों से शब्द किस प्रकार परिवर्तित हो जाते हैं, इस पर भी ध्यान रखना बहुत जरूरी है । ’स्वनिम अर्थात् ’फ़ोनेटिक’/ 'phonetic', ’रूपिम’ अर्थात् ’फ़िगरेटिव’ / figurative'. 
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|| तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ||
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(© Vinay Vaidya, 
vinayvaidya111@gmail.com, Ujjain / 06-06-2013.)
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