August 02, 2022

क्या डर ज़रूरी है?

भय और निर्भयता

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भय या डर वैसे तो जीवमात्र की एक स्वाभाविक जैव-प्रवृत्ति है, और प्रकृति-प्रदत्त यह प्रवृत्ति अपनी आत्म-रक्षा की प्रेरणा से ही पैदा होती है। यदि भय की यह प्रवृत्ति न हो तो जीव अपनी रक्षा नहीं कर सकता। जीव-जगत् में यह सर्वत्र और सभी प्राणियों में ही पाई जाती है किन्तु मनुष्य में यह किसी वैचारिक आधार से भी पैदा हो जाती है, या कर दी जाती है। यह मनुष्य का दुर्भाग्य ही है कि विचार, जो कि मनुष्य में चिन्तन का एक श्रेष्ठ साधन हो सकता है, वही संकीर्णता की सीमाओं में संकुचित हो जाने से वैचारिक भय का रूप ले लेता है। 

यह तो स्पष्ट ही है कि मनुष्य के अलावा कोई भी दूसरा जानवर या जीव, अपनी ही समान जाति के जीवों से तब तक भयभीत नहीं होता, जब तक इसके लिए कुछ और विशिष्ट कारण न हों। केवल मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है, जो वैचारिक जानकारी के आधार पर मनुष्य-समाज को ऐसे विभिन्न वर्गों में बाँट लेता है, जिनमें से प्रत्येक ही वर्ग के अपने अपने, दूसरों से एक हद तक भिन्न भिन्न विशिष्ट विश्वास, और मान्यताएँ, आचार-विचार और संस्कृति आदि होते हैं। इसी आधार पर विभाजित ये सभी वर्ग एक दूसरे के प्रति सशंकित, आशंकित, और कभी कभी तो आतंकित भी होते हैं। इसी वैचारिक आधार पर उनमें अपने वर्ग विशेष के संस्कारों के अनुसार विभिन्न प्रवृत्तियाँ पनपने लगती हैं। इन्हीं प्रवृत्तियों के कारण वे दूसरे समुदायों को संशय की दृष्टि से देखने लगते हैं। 

यह हुआ कृत्रिम भय या (Artificial Fear). 

सामाजिक परंपराओं (social traditions / religions) और परिस्थितियों के प्रभाव से मनुष्य ही प्रायः ऐसे कृत्रिम भयों का शिकार होता है, जबकि दूसरे सभी जीव केवल प्रकृति-प्रदत्त भय से ही प्रेरित होते हैं, और उसी के अनुसार अपनी रक्षा करने का प्रयास करते हैं, जबकि हम तथाकथित विचारशील मनुष्य, अनेक संभावनाओं की कल्पना कर, भविष्य के विचार से त्रस्त और व्याकुल, आशान्वित या निराश हो जाया करते हैं। विचार से जकड़ा हुआ ऐसा मनुष्य और ऐसे मनुष्यों के अनेक समुदाय सतत एक-दूसरे से भयभीत और आशंकित, तथा आतंकित भी रहने लगते हैं। और तब सभी समुदाय अपनी अपनी संस्कृति, सामुदायिक पहचान, अस्मिता आदि की रक्षा के लिए संगठित होने लगते हैं। इस दृष्टि से, मनुष्य यद्यपि एक  विचारशील एवं बुद्धिमान प्राणी तो हो गया है, किन्तु अभी भी विचार और बुद्धि से ऊपर उठकर सामूहिक विवेक और उसका महत्व क्या है, इसे वह नहीं समझ सका है।

हमारी संपूर्ण जानकारी-आधारित शिक्षा-प्रणाली ऐसी है, और हम यह कल्पना भी नहीं कर पाते हैं, कि किस प्रकार से हमारी सामूहिक चेतना में यह भय हममें से सभी को, और प्रत्येक को ही विशेष प्रकार से प्रभावित कर हमें संकीर्णताओं में सीमित कर देता है। जब तक ये सीमितताएँ हैं तब तक भय रहेगा, और जब तक भय है, तब तक हम इन सीमितताओं में बँधे ही रहेंगे। यह एक ऐसा दुष्चक्र है, जिसे हम सब को ही व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों ही प्रकारों से समझकर ही तोड़ना होगा। इसके बाद ही भय क्या है, निर्भयता क्या है, और भय कितना उचित और कितना अनुचित, आवश्यक या अनावश्यक है, इस बारे में समझ पाना हमारे लिए संभव होगा। 

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