August 26, 2025

THE SCHOLAR

अध्येता

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1970 के दौर में वह अध्येता था। अपनी इच्छा से नहीं, जीवन की वास्तविकता ने जिसे शायद विडम्बना भी कह सकते हैं, उसे अध्येता बना दिया था। उसने कभी शायद ही इस तरह से सोचा होगा।

वैसे वह उस समय 17 वर्ष की आयु का एक व्यक्ति था जिसके जीवन में कोई तय या ऐसा सुनिश्चित लक्ष्य नहीं था जिसके लिए वह दिल लगाकर कार्य करता। जीवन की आकस्मिक और तात्कालिक आवश्यकताएँ ही उसे किसी समय पर किसी दिशा की ओर खींचती रहती थीं और ऐसी एक दो या नहीं कुछ और भी दिशाएँ थीं, जो उसे लगातार कहीं जाने या पहुँचने के लिए शक्ति लगाती रहती थीं। कॉलेज नया था, शहर नया था, एक ओर कुछ सुविधाएँ तो दूसरी ओर कुछ सुविधाएँ, बाध्यताएँ आदि भी थीं। उनमें से ही उसे चुनना होता था कि क्या करना है और क्या किया जा सकता है। जैसे उसके पास एक अच्छी साइकिल थी, जिससे वह कॉलेज जाया करता था। आज 72 वर्ष की आयु हो जाने पर उसे लगता है कि वह न तो साइकिल चला सकता है, न उसे लेकर चल ही सकता है। आज जब 17 वर्ष की आयु के किसी ऐसे लड़के को देखता है जिसके पास मोबाइल और बाइक होती है तो उसे अपना वह बचपन याद आ जाता है जब उसके पास साइकिल होती थी और वह पूरे शहर में बस सार्वजनिक वाचनालय खोजता रहता था। समय बिताने और मनोरंजन करने का उसके पास कोई दूसरा साधन नहीं था।

उस शहर में तीन वाचनालय थे।  एक था ए बी रोड पर स्थित लक्ष्मी नारायण भुवन जो दोमंजिला था। नीचे के तल पर टेबल टेनिस खेला जाता था और ऊपरी मंजिल पर वाचनालय था। गरीब और मध्यमवर्गीय व्यक्ति होने के कारण और अपनी इस स्थिति के कारण हीन भावना का शिकार भी था, जबकि बचपन से ही लिखने-पढ़ने के वातावरण में ही पला बढ़ा होने से अखबार और किताबें आदि पढ़ने में उसे बहुत रुचि थी।

दूसरा वाचनालय शुक्रवार को लगनेवाले हाट में, चौराहे के बीचों-बीच एक गोलाकार भवन में हुआ करता था। तीसरा भोपाल रोड पर था, जहाँ रोजगार दफ्तर भी था।  तीनों ही वाचनालय शाम पाँच से आठ बजे के बीच ही खुला करते थे और वह इसी बीच उनमें से किसी एक पर जा पहुँचता था।

लक्ष्मी नारायण भुवन के वाचनालय में एक पुस्तकालय भी था, जबकि बाकी दोनों बस सिर्फ वाचनालय भर थे।

उन्हीं दिनों उसने उस वाचनालय से आचार्य रजनीश की पुस्तकें पढ़ना शुरू किया था। उस समय तक उनकी वह पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई थी जिसने कि बाद में रातोंरात ही उन्हें चर्चित किन्तु विवादास्पद भी बना दिया था। जैसे उस दौर में फिल्में बनती थीं जो चर्चित, साथ ही कम या अधिक कुछ विवादास्पद भी हुआ करती थीं, उसी तरह आचार्य रजनीश भी एकाएक ही विवादास्पद और चर्चित भी होने जा रहे थे।

उन्हीं दिनों धर्मवीर भारती की एक पुस्तक "चाँद और टूटे हुए लोग" उसके हाथ लगी जिसे वह साहित्यिक समझ रहा था। वह थी भी अभिजात्य और उच्च और संभ्रात वर्ग के लोगों की पसंद जिसे अंग्रेजी में एलीट कहा जाता है। उस वाचनालय में उससे भी बड़े एक और व्यक्ति से उसका परिचय हुआ जो एलीट तो नहीं थे, साहित्य से जुड़े अवश्य थे। बहुत बाद में उसे समझ में आया कि वे वामपंथी, सेकुलर (so cooler) और पत्रकार किस्म के एक बुद्धिजीवी थे जो किसी छोटे अखबार में काम करते थे। सरिता, मुक्ता और चंपक जैसी पत्रिकाओं में लिखा करते थे, जिससे उन्हें साहित्यकार भी समझा जाता था।  उनसे परिचय होने के बाद गजानन माधव मुक्तिबोध के साहित्य से उसका परिचय हुआ। उनकी रचना -

"चाँद का मुँह टेढ़ा है।"

पढ़ते ही उसे यह समझ में आ गया था कि "चाँद" शब्द से  मुक्तिबोध का आशय क्या हो सकता था / है।

बंबइया फिल्मों में ऊलजलूल कहानी, रहस्य, रोमांच, संगीत और उत्तेजनापूर्ण हिन्दी और उर्दू सामग्री को मिलाकर जैसे मसालेदार चटपटा और अटपटा सा कुछ परोसा जाता था, आचार्य रजनीश और इनके जैसे कुछ वामपंथी तथाकथित प्रगतिशील सेकुलर पत्रकार किस्म के लोग कभी धर्म, कभी गाँधी-नेहरू, तो कभी मार्क्स-लेनिन आदि के बहाने विविध चित्र विचित्र व्यंजन लोगों को परोसते रहते थे। इनमें सभी तरह के लोग थे - संभ्रात / एलीट से लेकर मिली जुली गंगा-जमुनी तहज़ीब तक के पैरोकार और विशुद्ध हिन्दुत्व, आर्यसमाज से लेकर कट्टर मतावलंबी तक भी।

इस पूरे मिक्स्ड वेज नॉन वेज सूप में वह कभी इधर, तो कभी उधर खिंचता हुआ, कॉलेज की पढ़ाई करता हुआ, नौकरी की संभावनाएँ टटोलता हुआ बेरोजगारी के दिन गिन रहा था।

कॉलेज में ही उसके बहुत से सहपाठी थे जिनमें से कुछ ठेठ ग्रामीण परिवेश से तो अन्य किसी दूसरी पृष्ठभूमि से आते थे। इतने अलग अलग किस्म के लोग उसके संपर्क में आए कि यह सोचकर अब उसे आश्चर्य होता है कि वह उनमें से किसी के भी रंग में रंगने से कैसे बच सका।

एक ओर जहाँ सिविल लाइंस में रहनेवाला ईसाई ज्वेल था, वहीं दूसरी ओर किला मैदान में रहनेवाला मजीद, तो उसका एक नास्तिक दोस्त भी उसे प्रभावित करने की कोशिश करते रहते थे। आर्य समाज और आर एस एस से जुड़े लोगों का अपना ही एक अलग वर्ग था।

ज्वेल कहा करता था कि भारत में अंग्रेजों ने इतना काम किया है लेकिन अब भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। गाँधी नेहरू की विरासत को हमें न सिर्फ सहेजना ही है, बल्कि उसे उसकी अंतिम परिणति तक भी पहुँचाना है। अंगरेजों ने बहुत से ऐसे काम किए। पहला यह कि पूरे भारत में हर स्थान पर सिविल लाइंस बनाई जिसमें सभी सिविलाइज्ड लोग रहते थे जो हर सन्डे को वहाँ बने चर्च में जाते थे। बाकी सभी अनसिविलाइज्ड थे, जो हिन्दू या मुसलमान, जैन, सिख, बौद्ध आदि अलग अलग तबकों में बँटे हुए थे, और आपस में लड़ते झगड़ते रहते थे। एक मजहब की किताब के अनुसार गॉड ने एक बार चाँद के दो टुकड़े कर दिए थे। और इसके बाद ही इंसानियत और इंसान भी दो में बँट गया। 

मजीद कट्टर इसलाम को मानता था और कहता था कि क़यामत के दिन तक धरती पर युद्ध तो चलते ही रहेंगे, कभी खत्म नहीं हो सकते हैं।

कुलदीप के दादा पाकिस्तान से भागकर आए हुए सिन्धी थे, जिसे जैसे तैसे अपना व्यापार व्यवसाय खड़ा करना था और उसे लगता था कि ये मजहब और धर्म फालतू लोगों की खुराफात के अलावा कुछ नहीं है। धरम और मजहब के नाम पर झगड़ा करना नासमझी है। वैसे वह अपने आपको सिख भी कहता था और हिन्दू भी। वहीं कॉन्वेन्ट में पढ़े सिविल लाइंस में रहनेवाले सिविलाइज्ड या अनसिविलाइज्ड कुछ और दोस्त थे जिन्हें कि आई ए एस या आई पी एस अफसर बनना था। और न हो सके तो डॉक्टर या इंजीनियर बनना था, मौका मिलते ही इस गँवार अनसिविलाइज्ड देश को छोड़कर यू के, यू एस ए या आस्ट्रेलिया में जाकर बसना है। वहीं की लड़की या लड़के से शादी करना है।

हर कोई बँटा हुआ था। बहुत से कट्टर राष्ट्रवादी ऐसे भी थे जिनका राष्ट्रवाद राजनीति से प्रेरित था तो दूसरे ऐसे भी कुछ थे जिनकी राजनीति राष्ट्रवाद से प्रेरित थी। यह राष्ट्रवाद फिर "क़ौम" के बहाने मजहबपरस्त रंग ले लेता था।

अब 72 वर्ष की उम्र में उसे समझ में आने लगा है कि क़ौम, कम्यून और कम्यूनिस्ट सभी शब्दों का संबंध मूल संस्कृत 'सं' उपसर्ग है जो अरबी में जामा और अंग्रेजी में  sum, con का रूप लेता है।

वह इस बारे में किसी से बहस करना तो दूर, बातचीत तक करने से बचता है, क्योंकि अपनी बाकी बची उम्र के कुछ इने गिने दिन शान्ति से जीना चाहता है। राजनीति की बिसात का मोहरा वह नहीं बनना चाहता।

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