March 30, 2025

The Thrill.

राधे राधे!

उस समय भी मैं वही था जो कि आज हूँ। और मेरे बारे में ही नहीं, सभी के बारे में भी यह सत्य है। हर कोई बस एक शुद्ध अस्तित्व मात्र होता है जो कि बस अपने-आप को ही जानता है।

उस समय से आज तक की स्मृतियों को टटोलता हूँ तो बस इतना ही समझ में आता है।

प्रत्येक ही मनुष्य की स्मृति में असंख्य घटनाएँ, अनुभव और उसका एक पूरा व्यक्तिगत संसार ही होता है जिसमें यद्यपि वह व्यक्ति तो होता ही नहीं, किन्तु जिसे स्मृतियों की निरन्तरता अपने स्वामी होने (की स्मृति) की तरह से  स्मरण रखा करती है।

किसी समय जब एक नए स्थान पर पहुँचा तब की एक  स्मृति कभी कभी सामने आ जाती है। दो वर्ष अपने बड़े भाई के साथ रहते हुए मैंने बिताए थे। पिताजी का फिर स्थानांतरण एक नए स्थान पर हो जाने से हम सब रहने के लिए वहाँ चले गए, बड़े भाई को छोड़कर, क्योंकि वह वहाँ कॉलेज में शिक्षक था।

मेरे पिताजी उस छोटे से गाँव में सरकारी स्कूल में प्राचार्य थे जहाँ उनका स्थानांतरण हुआ था। वह स्थान इसलिए भी मुझे प्रिय था क्योंकि वहाँ एक ही मुख्य और पक्की सड़क थी जो सीधी नामक जिला मुख्यालय से सिंगरौली नामक स्थान तक जाती थी। सिंगरौली तक और उससे भी आगे न जाने कहाँ तक। शायद गढ़वा और पता नहीं कहाँ कहाँ। दोस्त कहते थे कि उधर कैमोर की पहाड़ियाँ हैं। बहुत शान्तिपूर्ण स्थान था। पिताजी को रहने के लिए पी डबलयू डी का सरकारी क्वार्टर मिला हुआ था। कुल आठ दस या दर्जन भर क्वार्टर्स वहाँ थे जिनमें से सबसे बेहतर तीन एक साथ बने थे और जिसमें हम रहा करते थे।

पास के कुछ क्वार्टर्स को छोड़कर बाद में एक और भी था जहाँ कोई डॉक्टर रहा करते थे। हमारे सामने खेत थे जहाँ उन दिनों सरकारी राष्ट्रीय सर्वेक्षण विभाग के कुछ कर्मचारियों ने तम्बू लगा रखे थे। दो तीन महीने बाद ही वे वहाँ से चले गए। उसी पक्की सड़क पर वह स्कूल भी था जहाँ मैं पढ़ता था और जहाँ मेरे पिताजी प्राचार्य थे।

एक ग्वालन कभी कभी मटके में दूध, दही लेकर रोज ही आया करती थी। एक दिन उसके साथ एक और लड़की आई, जो शायद उसकी बेटी रही होगी। गोरी चिट्टी, और गोल मटोल चेहरा। तब मुझे पता चला उसका नाम राधा था। मैं उसे कौतूहल से विस्मय और आश्चर्य से देखता ही रह गया। उससे कोई बात या परिचय तक नहीं हुआ, न ही बाद में फिर कभी वह दिखाई दी, लेकिन उसका नाम और चेहरा मुझे अब भी याद है, याद नहीं करना पड़ता। किन्तु यह भी सच है कि बाद के पचास वर्षों में इस नाम को, और उसे भी मैं पूरी तरह भूल चुका था। उन्हीं दिनों मेरा बड़ा भाई कॉलेज की छुट्टियों में कुछ दिनों के लिए रहने के लिए जब वहाँ आया तो स्वामी दयानन्द सरस्वती का "सत्यार्थ प्रकाश" ग्रन्थ लेकर आया था, जिसे पढ़ते हुए मुझे बहुत सी ऐसी जानकारियाँ मिली जिनकी मुझे वस्तुतः जरा भी जरूरत उस उम्र में नहीं थी। उस ग्रन्थ में ही विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों और मतावलम्बियों के मतों के साथ वैदिक आर्य समाज नामक मत का परिचय मुझे प्राप्त हुआ। वहीं मैंने वृन्दावन, गोकुल, व्रज और मथुरा आदि के बारे में भी पढ़ा। और यह भी कि किस प्रकार से (भगवान्) श्रीकृष्ण के महाभारत में वर्णित चरित्र को कपटपूर्वक श्रीमद्भागवद्महापुराण नामक ग्रन्थ में वर्णित उनके पौराणिक चरित्र के रूप में, इस सीमा से परे तक, इतना विरूपित और परिवर्तित तक कर दिया गया, और महाभारत में वर्णित उनके चरित्र पर इस तरह मढ़ दिया गया कि उनके वास्तविक चरित्र का गरिमामय रूप हमें पूरी तरह विस्मृत हो गया और उनकी "भक्ति" के नाम, प्रचार पर भारतीयों को बुरी तरह से भ्रमित कर उनका ध्यान ही उससे हटाते गया। तब राधा-कृष्ण का प्रेम ही हमारे मन-मस्तिष्क में छा गया। गीता में वर्णित भगवान् श्रीकृष्ण की शिक्षाओं को दर्शन-शास्त्र का विषय बनाकर उसे भी जन साधारण की पहुँच से परे कर दिया गया। यह सब अवश्य ही एक सोची समझी साजिश तो थी ही, हम हिन्दू भी न सिर्फ इस साजिश का शिकार हुए बल्कि इससे मोहित होकर अपनी संस्कृति का सत्यानाश करने में संलग्न हो गए! 

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