January 04, 2019

अन्नदाता

अनेकान्त 
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जैन और वैदिक ग्रंथों में वर्णन है कि किस प्रकार सनातन काल से ऋषि-मुनियों और तपस्वियों को संसार की अनित्यता से वैराग्य होता रहा है और उस नित्य ध्रुव तत्व की जिज्ञासा से मुमुक्षा उत्पन्न होने पर वे उस चिरंतन के स्वरूप का चिंतन करते हुए अंततः उसे उपलब्ध कर लेते थे।
यहाँ एक दुरूह प्रश्न उठ खड़ा होता है।
वह चिरंतन तत्व किसी प्रयास से प्राप्त नहीं हो सकता क्योंकि समस्त प्राप्ति और भोग जिस अहंकार के लिए, उसके होने के सन्दर्भ में ही अर्थ रखते हैं, वह अहंकार ही उस तत्व को जानने में एकमात्र अवरोध है। उस तत्व को 'परमात्मा' कहना भी एक युक्तिवाद है क्योंकि वह सब का एकमात्र व्यक्त और अव्यक्त कारण और अधिष्ठान है। उसे 'ईश्वर' कहने पर भी वह अज्ञात और अज्ञेय ही होता है।  क्योंकि वह बुद्धिगम्य और इन्द्रियगम्य, भावगम्य और अनुभवगम्य नहीं है।
किंतु फिर भी उन ऋषि-मुनियों और तपस्वियों ने जिस प्रक्रिया से उस तत्व का साक्षात्कार किया उस प्रक्रिया को दूसरों के समक्ष रखने का प्रयास किया।
इस प्रयास को वेद, पुराण और इतिहास इन तीन शैलियों (genre) में व्यक्त रूप  दिया गया।
ये तीनों शैलियाँ मनुष्य विशेष की मानसिकता और बौद्धिक तथा आध्यात्मिक परिपक्वता के अनुसार उसे स्वयं ही उस तत्व को समझने और ग्रहण करने के लिए भिन्न भिन्न प्रकार से मार्गदर्शन देती हैं।
कर्म से या अकर्म से, विकर्म या धर्म से, जिस किसी भी प्रकार से उस तत्व की आकांक्षा और प्राप्ति मनुष्य को हो सके, इसके लिए ये ग्रन्थ अवश्य ही अतीव महत्वपूर्ण हैं।  हाँ यदि हम बहस पर अटक जाएँ तो वे जाने-अनजाने अहंकार को ही बढ़ाते हैं यह कहना अनुचित न होगा। और अहंकार ही तो मूल समस्या और अवरोध है !
जैसा कि गीता के अध्याय 4 के श्लोक 17 में उल्लेख है :
मनुष्य मात्र क्षण भर के लिए भी कर्म से रहित नहीं होता।
गीता के अध्याय 3 के श्लोक 8 के अनुसार :
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः।।
अर्थात् तुम्हें चाहिए कि तुम्हारे लिए जो उचित कर्म नियत किया गया है उसे करने के लिए तत्पर रहो।  क्योंकि कर्म करना, कर्म न करने से अर्थात् आलस्य और प्रमाद की अपेक्षा श्रेष्ठ है। और फिर, जीवन चलाते रहने के लिए, आजीविका के लिए भी तो मनुष्य को कर्म करना ही होता है।
चूँकि मनुष्य मात्र अपने गुण और कर्मों (संस्कारों) से ही विशेष प्रकार के कार्य में प्रवृत्त होता है इसलिए वर्ण और अवर्ण के आधार पर न भी देखें तो भी मनुष्य अपने शुभ अथवा अशुभ कर्मों के अनुसार ही उनके फलों का भागी होता है और फिर भी किस कर्म का फल कब प्राप्त होगा इस बारे में निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता, इसलिए भी मनुष्य को आकांक्षा-रहित होकर निष्काम भाव से कर्म करते रहना चाहिए।
गीता के ही अध्याय 5  के श्लोक 5 में कहा गया है :
यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति।।
अर्थात् वह परम तत्व जिसे उन ऋषियों मुनियों और तपस्वियों ने पाया, उसे कर्म (अर्थात् व्यावहारिक रूप) से भी पाया जाता है और बुद्धि के परिपक्व, ऋजु और सूक्ष्म होने पर विवेक-वैराग्य के जाग्रत होने पर भी वह साक्षात् जाना जाता है।  इस प्रकार संक्षेप में उसे सांख्य और कर्म दोनों युक्तियों से पाया जा सकता है।
सामान्यतः हर मनुष्य में कर्तृत्वभाव प्रकृतिप्रदत्त ही होता है इसलिए उसे कर्म करते हुए धीरे धीरे निष्काम कर्म कैसे किया जाए इस स्थिति तक जाने के लिए कहा जाता है। किंतु किसी किसी मनुष्य में खोज की प्रवृत्ति इतनी प्रबल होती है कि वह प्रत्येक कर्म के मूल में 'कर्ता' कौन / क्या है इसे समझने के लिए उत्सुक होता है।  अपनी खोज में वह पाता है कि :
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकार-विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।
(गीता अध्याय 3, श्लोक 27)
अर्थात् सभी कर्म प्रकृति के द्वारा ही गुणों के माध्यम से संचालित होते रहते हैं।  किंतु अहंकार से मोहित बुद्धियुक्त मनुष्य अपने-आपको स्वतंत्र कर्ता मान बैठता है।
सांख्य-विवेक प्राप्त होने पर मनुष्य इस तथ्य से भली-भाँति अवगत हो जाता है कि ऐसा स्वतंत्र कर्ता कहीं नहीं है, और यद्यपि कर्म स्पष्ट दिखाई देता है, उसका कारण (प्रकृति को भी) स्वयं जड होने से कर्ता नहीं कहा जा सकता।  इस प्रकार 'कर्म' केवल विचार है जो होता दिखाई देता है और पुनः विलीन हो जाता है, -और तभी जाना जाता है जब कोई उसका विचार करता है।
इसीलिए सामान्य मनुष्य को भी उन ऋषियों मुनियों और तपस्वियों ने त्याज्य और निषिद्ध कर्म न करने की शिक्षा दी। जैसे कृषि।
वेन के पुत्र पृथु ने सर्वप्रथम धरती को हल चलाकर खेती का प्रारम्भ किया।
इस प्रकार गाय को, जो पहले केवल दूध के लिए पाली जाती थी और फिर गोवंश की वृद्धि के लिए उपलब्ध उसके बछड़े को बैल बनाकर कृषि कार्य में लगाया गया। यह प्रकृति के प्रति हिंसा थी।
इसलिए कृषि को पाप तक कहा गया।
किंतु जब एक बार मनुष्य ने प्रकृति पर निर्भर रहना त्याग दिया तो प्रकृति भी वर्षा के क्रम में अनिश्चयपूर्ण व्यवहार करने लगी। तब उस सनातन वेद धर्म का उदय हुआ जिसने यज्ञ आदि द्वारा 'इंद्र' को प्रसन्न कर वर्ण-व्यवस्था को स्थापित किया। यह व्यवस्था वैसे तो सनातन है किंतु इसकी अपनी मर्यादा है। उस मर्यादा का निर्वाह जब तक किया जाता है, यह अपेक्षाकृत सुस्थिर मानव-सभ्यता का आधार होती है।
यह तो रहा प्राचीनतम इतिहास।
इस प्रकार भारत में गाँवों और नगरों की सभ्यता और संस्कृति कृषि-आधारित थी।
अंग्रेज़ों का भारत पर शासन शुरू होने के बाद धीरे-धीरे कृषि में 'उन्नत तकनीक' के नाम पर पहले यंत्र आए और इस प्रकार 'बैल' को अनुपयोगी बना दिया गया।  गोमांसभोजी विदेशियों के लिए तो यह एक और मौक़ा था जिससे भारत में गोवंश उनके लिए एक सस्ता था।
फिर आए कल-कारखाने जिनमें नदियों का पानी बेतहाशा इस्तेमाल किया गया और इन कल-कारखानों का कचरा उन नदियों के प्रदूषण को बढ़ाने लगा।  फिर बिजली पैदा करने के लिए बड़े बड़े बाँध बनाए गए जिनसे जमीन जलराशि का स्वाभाविक प्रवाह बाधित हुआ।  जमीन के नीचे जहाँ भूमिगत अस्थिर परतें (tectonic plates थीं उन पर बड़े बांधों का दबाव पड़ने से lithosphere (यह पूरी सतह) की संरचना इस हद तक प्रभावित हुई कि धरती पर भूकंप-प्रवण क्षेत्रों की संख्या बढ़ गयी।  कोयना नदी पर स्थित बाँध या टिहरी परियोजना इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं । विकास किस कीमत पर ?
भौतिक-विज्ञान के तथाकथित विकास के नाम पर चिकित्सा क्षेत्र में अनुसंधान और प्रयोगों से एक ओर मनुष्य की औसत आयु में वृद्धि  हुई वहीँ अनेक नए कारणों से प्राकृतिक और मानव के क्रिया-कलापों से दुर्घटनाओं आदि से मनुष्य और दूसरे प्राणियों का जीवन अधिक असुरक्षित हो गया।
किसान जो अन्नदाता है, इस पूरे विकास की मार से सर्वाधिक प्रभावित हुआ क्योंकि उसने प्राकृतिक खेती और पशुधन को साधन न समझकर उपभोग की वस्तु समझ लिया।  गाय, भेड़, बकरी आदि की लाभप्रदता आर्थिक दृष्टि से कम महत्त्व की हो गई।  खेती और जंगल दोनों भूमि के प्रकृतिप्रदत्त नैसर्गिक संसाधन हैं और खेती और जंगलों के विनाश के साथ शहरी सभ्यता के विस्तार और जनसंख्या-विस्फोट के कारण, विज्ञान और तकनीक की चकाचौंध से अंधी हुई आँखों के कारण मनुष्य अब यह देख भी नहीं पाता कि विकास के नाम पर वह केवल विनाश के ऐसे भंवर में पड़ चुका है जिससे बचने का कोई उपाय और आशा नहीं।
हम सोचते हैं कि चमत्कारिक आविष्कारों के द्वारा हम अधिक संपन्न और सुखी हो सकते हैं जो कोरा भ्रम है, क्योंकि यह स्वाभाविक नहीं है।  केवल कृत्रिम उत्तेजनाओं और उत्सुकताओं को इन नित नए आविष्कारों से तात्कालिक प्रसन्नता प्रायः होती है किंतु मन को वह शांति नहीं मिल सकती जो सरल नैसर्गिक जीवन जीने से मिलती है। हाँ वहाँ जन्म भी है, रोग भी है, मृत्यु भी है और सांसारिक रूप में भौतिकता की मर्यादा भी है किंतु जीवन के लिए उतना ही पर्याप्त और आवश्यक है।
किसान जब तक और जहाँ तक जितना अधिक प्रकृति से जुड़ा है, वह और उसका पूरा समाज भी तब तक उतना ही अधिक समृद्ध, संपन्न, सुखी हो सकता है।
लेकिन विकास की दौड़ में लोभ और भय से अभिभूत किसान को और मानव सभ्यता को भी यदि आत्महत्या से बचाना है तो प्रकृति की ओर लौटना, यंत्रों और वैज्ञानिक आविष्कारों का बहिष्कार ही एकमात्र उपाय है। विज्ञान का अध्ययन ज्ञान के संवर्धन के लिए हो इससे क्या ऐतराज हो सकता है लेकिन जब लोभ या भय से उस ज्ञान का दुरुपयोग किया जाता है तो वह अंततः विनाशकारी ही होता है। यह विज्ञान की मर्यादा है।
मुझे नहीं पता यह लेख कितने लोगों के गले उतरेगा !  वास्तव में इस संसार को बदलने या सुधारने का दायित्व और क्षमता अकेले मुझमें ही कैसे हो सकती है? पर, इसके लिए दुःखी होने से बचना भी तो मेरे बस में नहीं है !
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December 23, 2018

वहम और यक़ीन

धरती गोल है चपटी ?
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उसे भरोसा नहीं था कि मैं उसे सही साबित कर सकूँगा ।
फिर भी वह अपने इस आग्रह पर डटा था कि विज्ञान या N.A.S.A. भले ही लाख सिद्ध करें, धरती / दुनिया चपटी है न कि गोल (क्योंकि उसका धर्मग्रंथ गलत नहीं हो सकता था)!
पहले तो मैंने उसे भारतीय ज्योतिष-विज्ञानी (Astronomer) भास्कराचार्य का लिखा एक श्लोक प्रमाणस्वरूप दिखलाया जिसका भावार्थ था :
"जैसे किसी बहुत बड़े गोले (वृत्त) की परिधि का सौंवां हिस्सा सीधा जान पड़ता है, उसी तरह धरती भी क्षितिज तक सीधी दिखलाई पड़ती है किंतु दूर क्षितिज पर दिखलाई पड़नेवाला पेड़ पास जाने पर अधिक ऊँचा जान पड़ता है क्योंकि उसके पास जाने पर वहाँ धरती की ऊँचाई कुछ कम हो जाती है, मतलब धरती सीधी न रहकर कुछ झुक जाती है।  इसी तरह समुद्र पर दूर दिखलाई पड़ता जहाज शुरू में काम ऊँचाई का दिखाई देता है लेकिन पास आते-आते अधिक ऊँचा दिखने लगता है क्योंकि समुद्र की सतह भले ही समतल दिखाई देती हो, धरती की सतह के साथ साथ बड़े वृत्त के हिस्से की तरह वक्र होती है।"
"मैं नहीं मान सकता।"
"अच्छा, अगर मैं मेरी किताब से यह साबित करूँ कि धरती चपटी भी है और गोल भी तो?"
वह हैरत से मुझे देखने लगा।
"देखो, वाल्मीकि रामायण में 'विवस्वान्-पथ' का वर्णन है।  जिसके अनुसार ऋषि विश्वामित्र त्रिशंकु को सदेह (बिना मृत्यु हुए) स्वर्ग भेजने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन देवता उसे स्वर्ग में सदेह आने देना नहीं चाहते थे।  तब देवताओं और ऋषि विश्वामित्र के बीच यह समझौता हुआ कि त्रिशंकु को 'विवस्वान्-पथ' से बाहर अंतरिक्ष में स्थायी जगह दिला दी जाए जिससे वह आकाश के किसी तारे की तरह अपने इर्द-गिर्द के बहुत से तारों के बीच तय स्थान पर दिखाई देता रहे, न कि चन्द्रमा, सूर्य या मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि जैसा भिन्न भिन्न राशियों में घूमते रहनेवाला।"
मेरी बात उसे समझ में तो नहीं आई और वह और भी ज़्यादा हैरत से मुझे देखने लगा।
अपने swaadhyaaya blog ... में लिखी पोस्ट्स में मैंने 'विवस्वान्-पथ' नामक पोस्ट में लिखा था कि वाल्मीकि-रामायण में किए गए उल्लेख सत्य के तीन तलों (dimensions) को एक साथ सन्दर्भ देकर लिखे गए हैं।  यदि सत्य का वर्णन केवल आध्यात्मिक या केवल आधिदैविक या केवल आधिभौतिक सन्दर्भ में, या इनमें से किन्हीं दो ही तलों को ध्यान में रखकर किंतु तीसरे की अवहेलना करते हुए किया जाए तो वह भ्रमकारक होता है। इसी ब्लॉग में मैंने यह उल्लेख भी किया है कि सूर्य और सौरमंडल के सभी ग्रह जो सूर्य के इर्द-गिर्द परिभ्रमण करते हैं एक ही तल में भिन्न-भिन्न समानांतर वृत्ताकार / अंडाकार कक्षाओं में निरंतर गतिशील हैं।  यह वैसा ही है जैसे एक ही डोरी में भिन्न-भिन्न दूरियों में कुछ पत्थर बाँध कर डोरी को तेजी से गोल घुमाया जाए।  तब परस्पर बंधे होने से सभी पत्थर एक ही तल (plane) में स्थित होकर भिन्न-भिन्न वृत्तों में घूमेंगे।
ठीक इसी भाँति सौरमंडल के ग्रह भी  गुरुत्वाकर्षण-बल की डोरी में बँधे सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाकर एक ही तल (plane) में स्थित रहते हैं। इसी तल को विवस्वान्-पथ कहा गया है और ऋषि विश्वामित्र ने त्रिशंकु को इसी तल (plane) पर स्थापित करने का प्रयास किया था जो देवताओं (सूर्य आदित्य होने से उस आधिदैविक देवलोक का अधिष्ठाता है जिसमें सभी ग्रह जो सूर्य की परिक्रमा करते हैं, आधिदैविक देवता हैं और यद्यपि पृथ्वी स्वयं भी इसी तल से साढ़े 23 अंश पर झुकी सूर्य की परिक्रमा करती है, अन्य ग्रह इस तल से कितने अंश झुके हैं या नहीं यह हमें नहीं पता)।
त्रिशंकु निश्चित ही कृत्रिम उपग्रह (satellite) रहा होगा जिसके तीन शंकु (cones) रहे होंगे जैसा कि इस युग के बहुत से मनुष्य-निर्मित कृत्रिम उपग्रह (satellite) हुआ करते हैं। किंतु देवताओं और इंद्र तथा विश्वामित्र के मध्य अंततः यह स्वीकार किया गया कि उस त्रिशंकु नामक कृत्रिम उपग्रह (satellite) को इस 'विवस्वान्-पथ'से बाहर अंतरिक्ष में स्थान दिया जाए।  तब से खगोलविदों (astronomers) को वह 'तारा' आकाश में स्थिर तारे की तरह किसी राशि-विशेष के तारे जैसा दिखाई देता है। 
इस  यदि दुनिया / सौरमंडल को इस 'विवस्वान्-पथ' के रूप में देखें तो दुनिया अवश्य ही चपटी है।
इस प्रकार दुनिया एक दृष्टि से यद्यपि समतल अर्थात् चपटी कही जा सकती है, वहीँ जब इसे पृथ्वी तक सीमित समझा जा सकता है तो वह एक गोल पिंड है जो अन्य ग्रहों की तरह ही सूर्य का एक उपग्रह है।
ज्योतिष-शास्त्र (Astrology) की दृष्टि से देखें तो ये सभी ग्रह 'देवता' अर्थात् आधिदैविक / अधिमानसिक (supra-mental) अस्तित्व रखते हैं किंतु खगोल-शास्त्र की दृष्टि से इनका अस्तित्व आधिभौतिक अर्थात स्थूल इन्द्रिय-बुद्धिगम्य तथाकथित 'वैज्ञानिक' आधार पर भी है।
यदि वाल्मीकि-रामायण का अध्ययन इस दृष्टिकोण से करें तो यह समझा जा सकता है कि :
दुनिया 'गोल' है या चपटी !
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December 12, 2018

वर्तमान : तीन चित्र

वर्तमान : तीन चित्र
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चित्र -1
हिंदुत्व 
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कुछ वर्षों पहले स्वर्गीय बलराज मधोक के बारे में एक पोस्ट लिखा था।
तत्कालीन जनसंघ में वही एक सबसे अधिक प्रबुद्ध बुद्धिजीवी थे जिन्होंने 'हिंदुत्व' के विचार के ख़तरे को समझा था। बाद में जनसंघ ने उन्हें अलग-थलग कर दिया था क्योंकि सत्ता के लोलुप दूसरे बुद्धिजीवियों को इस 'हिंदुत्व' के विचार (या इसके विरोध के विचार) से बहुत उम्मीदें थीं।
सावरकर ने इसे इस्लाम के विचार के खिलाफ अपरिहार्यतः ज़रूरी समझा और यही हिंदूवादी संगठनों की भयंकर भूल थी, यह आज तक किन्हीं हिंदूवादियों को समझ में नहीं आ रहा। जहाँ एक तरफ देश की जनता में 'हिन्दू गौरव' को इस्लाम के सामने उसके मुक़ाबले में खड़ा कर दिया गया, वहीँ हमारे बहुत से संत महात्मा भी इस धोखे से बचे न रह सके। अंग्रेज़ों ने इस्लाम, ईसाइयत, बौद्ध, जैन, सिख, यहूदी, पारसी, आदि परम्पराओं को धर्म (religion) कहकर 'हिंदुत्व' पर भी 'धर्म' की मुहर लगा दी और हमने उसे आँख मूंदकर स्वीकार कर लिया।
फिर 'सर्वधर्म-समत्व' के राजनैतिक विचार का आविष्कार गाँधीजी ने किया।
आचार, विचार, व्यवहार, संस्कार, और इतिहास के आधार पर उपरोक्त सभी परम्पराएँ जिन्हें 'धर्म' कहकर हमें परोसा गया, न सिर्फ परस्पर अत्यंत भिन्न प्रकृति की हैं, बल्कि उनके बीच सामञ्जस्य कर पाना असंभव की हद तक मुश्किल है। इस प्रकार अंग्रेज़ों ने सामान्य जनमानस में न सिर्फ परस्पर विद्वेष और मतभेद पैदा किए, बल्कि उनके बीच घृणा और वैमनस्य को भी पैदा किया और उसे हवा भी दी।  भारत का विभाजन इसी वैमनस्य का परिणाम था, जिसके लिए तत्कालीन नेतागण सत्ता-लोलुपता के कारण ख़ुशी ख़ुशी तैयार हो गए।
इस बीच उपरोक्त तथाकथित 'धर्मों' के मूल सिद्धांतों में से कुछ न्यूनतम 'समान विचार' चुन लिए गए ताकि उनके द्वारा इस झूठ को सत्य की तरह स्थापित किया जाए कि सभी 'धर्म' समान हैं। ज़ाहिर है कि न्यूनतम समानताओं को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर अधिकतम विरोधाभासों को आँखों से ओझल कर दिया गया।
इसका परिणाम यह हुआ कि हिंदूवादी धर्म जहाँ 'हिंदुत्व' के छाते के नीचे संगठित हुए वहीँ दूसरे 'धर्म' वाले भी अपने-अपने संगठन बनाने लगे। जिन 'धर्मों' के सिद्धांत मूलतः अन्य 'धर्मों' से भिन्न हैं उनके संगठनों के बीच परस्पर प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या, वैमनस्य, अविश्वास, संदेह और भय उत्पन्न हुआ और इसका लाभ उन राजनीतिक शक्तियों ने लिया जिनका उद्देश्य समाज के किसी वर्ग / समुदाय की धार्मिक स्वतन्त्रता के बहाने सत्ता पर कब्ज़ा करना तथा अपनी राजनैतिक शक्ति बढ़ाना था। यह अविश्वास आज भी विद्यमान है और  इसे दूर नहीं किया जाता, इस समस्या का कोई निदान नहीं हो सकता। 
'हिंदुत्व' का विचार इस दृष्टि से दोनों ही रूपों में समाज और राष्ट्र के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ कि कुछ हिन्दू जहाँ कट्टर 'हिंदुत्ववादी' हो गए वहीँ कुछ 'हिन्दू' 'सेकुलर' / धर्मनिरपेक्ष होने के भ्रम में इन कट्टर 'हिंदुत्ववादियों' के घोर विरोधी हो गए। इस प्रकार अपने आपको 'हिन्दू' कहलानेवाले लोग इन दो धड़ों में बँट गए।
कुल परिणाम यही हुआ कि इससे सर्वाधिक लाभ उन्हीं राजनैतिक शक्तियों को मिला जो गैर-हिंदुत्ववादी थे।
श्री बलराज मधोक ने इस यथार्थ को समझा और जनसंघ से उनकी दूरी इसीलिए हो गयी क्योंकि दूसरे नेता यह सरल सत्य या तो समझ ही नहीं पाए, या उन्होंने जान-बूझकर इस सत्य से आँखें फेर लीं।
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चित्र -2 
राजनीति 
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पिछले चार वर्षों में भाजपा और मोदी जी की सफलता का राज़ यह नहीं था कि उन्होंने 'हिन्दू-समाज' को संगठित किया, बल्कि इसका एकमात्र कारण था कांग्रेस सरकार की सत्ता-लोलुपता, भ्रष्टाचार और देश के हित की उपेक्षा की कीमत पर भी जनता की भयंकर उपेक्षा करना । दूसरे भी दल कमोबेश ऐसे ही थे / हैं और भाजपा या शिवसेना, पीडीपी इत्यादि इसका अपवाद थे ऐसा नहीं कह सकते। राम-मंदिर, समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) आदि ऐसे ही बिंदु थे जिन पर 'वोट-बैंक' का सहारा लेनेवाले कभी किसी दृढ निश्चय पर नहीं पहुँच सके। अब जनता ने कांग्रेस को भाजपा के मुकाबले शक्तिशाली बनाया है तो इसका भी कारण यह नहीं है कि कांग्रेस एकाएक दूध की धुली हो गयी है, बल्कि एकमात्र कारण है भाजपा से जनता की नाराज़ी। इसे कांग्रेस अपनी लोकप्रियता में वृद्धि समझ बैठे तो यह उसका भ्रम होगा।
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चित्र - 3 
ज्योतिष 
पिछले तीन चार माह के दौरान बस मनोरंजन के लिए you tube पर संतबेतरा अशोक के 'अखंड मंथन' को कभी कभी देखता था। उत्सुकता बस यह थी कि क्या सचमुच कोई ज्योतिषी या 'सिद्ध' किसी व्यक्ति, राष्ट्र, पार्टी, संस्था आदि का भविष्य देख / बता सकता है? उपरोक्त चैनल में मेरी उत्सुकता का एक कारण यह भी था कि मुझे हमेशा लगता रहा है कि कोई किसी का भविष्य 'देख' ही नहीं सकता क्योंकि जिसे 'भविष्य' कहा जाता है वह केवल किसी घटना का एक मानसिक चित्र होता है जो स्वयं ही जब निरंतर बदलता रहता है तो उस घटना की सत्यता कितनी सुनिश्चित हो सकती है? फिर भी, यदि मोटे तौर पर मान भी लिया जाए कि सांख्यिकीय परिभाषा के अनुसार कुछ घटनाओं के सत्य सिद्ध होने की संभावना हो सकती है जैसे पानी बरसना या आंधी आना, भूकंप या पुलों भवनों का टूटना-गिरना और कोई सटीकता से उनकी 'भविष्यवाणी' भी कर सकता है, किसी की मृत्यु या शादी कब होगी, तो भी क्या कोई इसे 'बदल' सकने का दावा भी कर सकता है? अर्थात् क्या किसी 'अनुष्ठान' मन्त्र-तंत्र, या दूसरे ज्योतिषीय उपाय से कोई इस 'भविष्य' को बदल सकता है? स्पष्ट है कि यदि कोई ऐसा दावा करता है तो वह झूठ बोल रहा है।  क्योंकि यदि वह भविष्य को 'बदल' सकता है तो इसका मतलब हुआ कि  उसने 'जो' भविष्य 'देखा' था वह 'वैसा' यथावत सत्य नहीं था । इसका मतलब यह हुआ कि न तो वह भविष्य को देख सकता है और न बदल सकता है।
इसी उत्सुकतावश मैं उपरोक्त चैनल देखा करता था।
मैं नहीं कह सकता कि इन तथा इनके जैसे अनेक ज्योतिषियों में इतना अधिक आत्मविश्वास कहाँ से आ जाता है कि वे बेधड़क ताल ठोंक कर भविष्यवाणियाँ करते हैं। और उन्होंने इसकी भी कल्पना तक शायद ही की होगी कि उनकी भविष्यवाणियाँ गलत सिद्ध होने पर कितने लोगों की आस्था को ठेस पहुँचती होगी और उन्हें स्वय कितना शर्मिन्दा होना पड़ सकता है।
बहरहाल मनुष्य मानसिक कल्पना से इतना अभिभूत हो जाता है कि वह असंभव तक को संभव मान बैठता है और ज्योतिष के जानकार तथा उनकी शरण में जानेवाले भी इसका अपवाद नहीं होते। अतिरंजित आत्मविश्वास और आत्म-मुग्धता का मेल होने पर यही होता है।
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December 02, 2018

यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है ...

यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है ...
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25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 के लगभग 21 माह के समय में एक और जहाँ तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने देश पर इमरजेंसी लगा दी थी, वहीँ मेरे अपने जीवन और भाई-बहनों तथा माता-पिता के लिए भी यह ऐसा ही एक दौर था। जैसा कि कहा जाता है :
आदमी तो नहीं पर वक्त बुरा होता है।
(जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा होता है।)
इसलिए न किसी से कोई शिकायत रही और न शायद किसी को किसी से होनी चाहिए।
मेरे अपने लिए जहाँ यह दौर बहुत नाउम्मीदी और संघर्ष का था वहीँ इसी दौर ने उठ खड़े होने का जज़्बा मुझमें पैदा किया। चढ़ाई मुश्किल थी लेकिन मुझे जो मंज़िल चाहिए थी वह देर-अबेर मिल ही गई।  बाकी चीज़ों का  मिलना-बिछुड़ना तो दुनिया का उसूल है।
उन्हीं दिनों स्व. दुष्यंत कुमार जी की शायरी पढ़ने का मौक़ा मिला था।
मेरे अपने जीवन में इमर्जेन्सी वैसे तो 21 मार्च 1977 को ही हट चुकी थी किंतु इसका जो पूरा असर मेरे अपने परिवार पर पड़ा उसने मेरे पारिवारिक संबंधों को लगभग समाप्त कर दिया।  हाँ पहचान बाकी है और जब तक जीवन है स्मृति से भी समय समय पर वह पहचान पुनः सामने आती रहेगी।
बहरहाल, उन्हीं दिनों स्व. दुष्यंत कुमार जी की शायरी 'साये में धूप' की पहली ग़ज़ल का पहला शे'र :
यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगाती है,
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए।
पढ़ा था : 
तब से बहुत बाद तक जिंदगी बीत जाने के बाद लगा कि शायर का संकेत जो भी रहा हो,  यह आज की राजनीति और तथाकथित 'धर्म' और 'धर्म' के स्वघोषित ठेकेदारों पर पूरी तरह लागू होता है।
यह विडंबना ही तो है कि दरख़्त जिसके नीचे साये की उम्मीद होती है, वहाँ धूप लगने लगे।
किंतु इस विडंबना के मूल राजनीति में हैं और राजनीति ने संस्कृति, साहित्य, कला (संगीत) और अध्यात्म को, विशेष रूप से सनातन धर्म को इस बुरी तरह नष्ट किया कि इसके शिकार वे तमाम लोग रहे जिन्हें बुद्धिजीवी होने का आकर्षण लुभाता रहा।
इमरजेंसी वैसे तो ख़त्म हो गई किंतु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार और अभिव्यक्ति का दमन राजनीति की सनक से परिभाषित और तय होने लगा।
मेरे अपने लिए तो मार्गदर्शक सिद्धांत यही रहा :
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यं अप्रियं ,
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्म सनातनः।
इसलिए राजनीति, लोकधर्म और दुनिया की दूसरी बातों पर कुछ कहने-लिखने का मेरा अधिकार, न कर्तव्य और न दायित्व ही मुझ पर शेष रहा।  और हाँ 'अधिकार' का एक अर्थ है योग्यता।  और न तो ज़रुरत या कोई अवसर है इसे भी मैं अपना सौभाग्य ही समझता हूँ।
और वैसे भी कौन मुझे पूछता है?  
और इसलिए भी किसी से कोई शिकायत नहीं । 
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December 01, 2018

कविता / 01-12-2018

कविता
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सुख कहाँ नहीं है?
शीत में धूप का सुख,
ग्रीष्म में छाया का,
माया में ब्रह्म का सुख,
ब्रह्म में माया का,
देह में प्राणों का सुख,
प्राणों में काया का,
काया में जगत का सुख,
सुख में सब समाया सा।
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November 24, 2018

रामलला !

यदा-यदा हि 
20 जनवरी 2009 को गूगल पर प्रयोग के लिए यह ब्लॉग शुरू किया था।
रामलला के जन्म-स्थल को ध्वस्त कर आततायी अधर्म ने कोई भवन वहाँ खड़ा किया था।
बाबर का धर्म आततायी था / है या नहीं, इस बारे में कुछ कहने का अधिकार मुझे नहीं है और न मैं इस बारे में ठीक से जानता हूँ।  न ही किसी की धार्मिक भावनाओं पर आघात करना मैं चाहूँगा।  किन्तु बाबर का कृत्य अवश्य ही अधर्म का ही ज्वलंत उदाहरण है यह कहना अनुचित न होगा।
किसी भी धर्म-स्थल को ध्वस्त करना क्या अधर्म ही नहीं है?
गीता में अध्याय 3 श्लोक 35 तथा अध्याय  18 श्लोक 47 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं :
अध्याय 3, श्लोक 35,
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श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥
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(श्रेयान्-स्वधर्मः विगुणः परधर्मात्-स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मः भयावहः ॥
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भावार्थ :
अच्छी प्रकार से  आचरण में लाये हुए दूसरे के धर्म से, अपने अल्प या विपरीत गुणवाले धर्म का आचरण उत्तम है, क्योंकि जहाँ एक ओर अपने धर्म का आचरण करते हुए मृत्यु को प्राप्त हो जाना भी कल्याणप्रद होता है, वहीं दूसरे के धर्म का आचरण भय का ही कारण होता है ।
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अध्याय 18, श्लोक 47,
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श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति  किल्बिषम् ॥
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(श्रेयान् स्वधर्मः विगुणः परधर्मात् सु-अनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतम् कर्म कुर्वन् न आप्नोति किल्बिषम् ॥)
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भावार्थ :
अच्छी प्रकार से आचरण किए गए दूसरे के धर्म की तुलना में अपना स्वाभाविक धर्म, अल्पगुणयुक्त हो तो भी श्रेष्ठ है, क्योंकि अपने स्वधर्मरूप कर्म का भली प्रकार से आचरण करते हुए मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता ।
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बाबर के अनुयायी भी इससे इंकार नहीं कर सकते।
बाबर का 'धर्म' जो भी रहा हो, बाबर का यह कृत्य धर्म कैसे कहा जा सकता है ?
इसलिए बाबर का धर्म माननेवाले यह भी मानेंगे कि इस ऐतिहासिक भूल को सुधारने का समय आ गया है।
और इस बात के लिए सभी मिल-बैठकर सौहार्द्र से बातचीत कर परस्पर सहमति और प्रसन्नता से अयोध्या में श्रीराम के मंदिर को बनाने के लिए, रामलला के वचन को पूरा होने देने के लिए अवसर प्रदान करने का श्रेय भी ले सकते हैं।
इसके लिए सरकार के द्वारा कानून बनाए जाने की माँग करने का मतलब है सरकार को इसका श्रेय देना।
लेकिन सरकार किन्हीं भी कारणों से निर्णय लेने में असमर्थ दिखाई देती है।    
उस स्थान की अक्षय स्मृति धर्म के मानस-पटल पर आज भी पत्थर की लकीर से भी अधिक अमिट अक्षरों में अंकित है।
रामलला भला कैसे भूल सकते हैं ?
उन्होंने जो 'वचन' गीता में दिया था, उसे पूरा करना उनका ही दायित्व है किंतु हम भारतवासी अपना कर्तव्य क्यों भूलें?
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श्री पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ  के you-tube पर दिए गए इस उद्बोधन को पढ़कर साहस हुआ कि 'अयोध्या' के बारे में यह पोस्ट प्रस्तुत करूँ।  वैसे मैं भी उन्हीं की तरह, किसी भी राजनीतिक विचारधारा / पार्टी से सर्वथा असम्बद्ध हूँ।
यहाँ यह लिंक इसीलिए दे रहा हूँ कि सभी पढ़नेवाले उनके विचारों से अवगत हो सकें।
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November 15, 2018

एक अधूरी कहानी

अधूरी खबरें 
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खबरों की भीड़ में भी हम शायद ही कभी कोई खबर पूरी तरह पढ़-सुन पाते हैं।  पूरी खबर वह भी नहीं होती जो हमारे अपने बारे में होती है, हालाँकि हम उसे याददाश्त के लिफ़ाफ़े में बंद कर मन की संदूक में रख देते हैं।  कभी-कभी उसे पूरी तरह पढ़े सुने बिना ही पुड़िया बनाकर हवा में उछाल देते हैं और भूल जाते हैं।  कभी-कभी बार-बार चुपके चुपके पढ़ते रहते हैं लेकिन तब भी वह पूरी नहीं हो पाती। बहुत से लिफ़ाफ़े और कभी कभी एक को खोलने की कोशिश में कोई दूसरा ही खुल जाता है।
कुछ खबरें चिट्ठियों की शक्ल में आती हैं तो कुछ कानोंकान सुनी जाती हैं।  दोनों स्थितियों में कुछ अधूरापन फिर भी होता ही है। कुछ खबरें हम किसी से शेयर करना चाहते हैं क्योंकि खुद से शेयर करने में डर लगता है।
वॉट्स-ऐप के समय में आप ऐसी ही कई अवाँछित खबरें रोज ही पढ़ते और डिलीट करते होंगे।
बहरहाल मेरी खुशकिस्मती रही कि मैंने कभी वॉट्स-ऐप जॉइन नहीं किया।
क्या होती है अधूरी खबर ?
कल ही एक ऐसी खबर पढ़ी।
एक बन्दर, एक माँ की गोद से उसके बच्चे को झपटकर ले गया।
विक्षिप्त कर देनेवाली ऐसी कितनी ही खबरें रोज़ घटती हैं, एक से एक हैरत भरी रोंगटे खड़े कर देनेवाली खबरें।  कोई भी, कहीं भी, कभी भी किसी अप्रत्याशित स्थिति का शिकार हो सकता है और कोई भी, कहीं भी, कभी भी किसी को अप्रत्याशित स्थिति में शिकार बना सकता है।
कभी तो ये घटनाएँ प्रत्यक्षतः और कभी अनचाहे ही प्रायोजित हुई होती हैं।
हर मनुष्य डरा हुआ और घबराया हुआ है फिर भी उत्तेजनाग्रस्त और उन्मादग्रस्त भी है।
निरंतर उत्तेजना की तलाश में, किसी सुख की तलाश में, किसी रोमांच की आशा में, जो उसके भविष्य को अधिक चमकदार बना दे, जोश और उमंग से भर दे, या किसी नशे में इस तरह डुबो दे कि कुछ समय तक संसार और समय का विस्मरण हो जाए।  यह नशा, एक किक हो सकता है या एक 'long-affair' भी हो सकता है।
जिसे वह 'प्यार' समझ सकता है। वह खेल, कला, संगीत, राजनीति या धर्म के क्षेत्र से जुड़ी कोई महत्वाकांक्षा भी हो सकता है। सबसे बड़ी बात कि वह निरंतर आगे (कहाँ?) बढ़ते रहने की अदम्य प्रेरणा भी देता है, जिसमें तमाम दुश्मनियाँ, घृणा, स्वार्थ एक मोहक आवरण में छिपे होते हैं।  जो दिखाई देता है वह वह नहीं होता, जो उस आवरण में छिपा हुआ होता है। 'सफलता' हमेशा क्षणिक ख़ुशी तो दे सकती है जो एक तरह का नशा भी हो सकता है। उतर जाने के बाद पुनः उसे पाना होता है।
कोई खबर कभी पूरी कहाँ होती है? किंतु नई खबरों के लिए हमारी उत्सुकता बनी ही रहती है।  इतनी खबरे हमें रोज़ मिलती रही हैं, -क्या उनसे हमारे मन को कभी ऐसी शान्ति मिलती है कि हम आराम से थोड़ी देर सो सकें? होता तो यही है कि बुरी तरह थक जाने पर भी किसी नई खबर की उम्मीद में हम नींद को आने ही नहीं देते।  यह आदत बन जाती है।
यह भी एक अधूरी कहानी है।
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November 12, 2018

आर्यान्

अयोध्या, अमित शाह और ओवैसी
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ओवैसी ने श्री अमित शाह को कहा कि उनका नाम ईरानी है और यदि इलाहाबाद तथा फैज़ाबाद का नाम बदला जाना चाहिए तो उन्हें खुद का नाम भी बदल लेना चाहिए।
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वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड, सर्ग 54 में वर्णन है :
इत्युक्तस्तु तया राम वसिष्ठस्तु महायशाः। 
सृजस्वेति तदोवाच बलं परबलार्दनम्।। 17
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सुरभिः सासृजत् तदा ।
तस्या हुंभारवोत्सृष्टाः  पह्लवाः शतशो नृप ।। 18 
नाशयन्ति बलं सर्वं विश्वामित्रस्य पश्यतः।
स राजा परमक्रुद्धः क्रोधविस्फारितेक्षणः  ।। 19
पह्लवान् नाशयामास शस्त्रैरुच्चावचैरपि।
विश्वामित्रार्दितान् दृष्ट्वा पह्लवाञ्शतश स्तदा  ।। 20
भूय एवा सृजद् घोराञ्छकान् यवनमिश्रितान्।
तैरासीत् संवृता भूमिः शकैर्यवन मिश्रितैः ।। 21    
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श्रीराम से यह कथा मुनि शतानन्द ने कही।
स्पष्ट है कि  इसमें पहलवी राजाओं के साथ साथ शक तथा यवन नरेशों की उत्पत्ति कैसे हुई यह बतलाया गया है।  महायशाः / यशाः से शाह का उद्भव दृष्टव्य है।  ईरान शब्द भी आर्यान् का अपभ्रश है। 
इसलिए अमित शाह को अपना नाम बदलने की ज़रूरत कदापि नहीं है। 
और न ही स्मृति ईरानी को।
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परशुराम ने 'परशु' को लेकर गोकर्ण (गोवा) की स्थापना की।  अरब सागर (फ़ारस की खाड़ी) से भूमि निकालकर परशु-देश (फारस) में अपना राज्य स्थापित किया।
इस परशु से अथवा पार्श्व या पार्षद (पारसी में फ़रिश्तः) के सज्ञाति / cognate अंग्रेज़ी / इटैलियन में  'फ़ार्स' / 'Farse' / 'Fascist' हुए।
मुसोलिनी की पार्टी का चिन्ह यही 'परशु' था जो कुल्हाड़ी जैसा लकड़ी या घास काटने का औज़ार था जिसे घास या लकड़ी के गट्ठर पर प्रदर्शित किया गया है।
इसी प्रकार जर्मन नाज़ी की पहचान संस्कृत 'नृ' से कैसे नृप, Natsion (nation)  से लेकर तमिल 'नाडु' (देश) से सम्बद्ध है इस पर विस्तार से अपनी बहुत सी पोस्ट में लिख चुका हूँ।
प्रसंगवश यहाँ लिखना उपयुक्त जान पड़ा।
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November 07, 2018

कविता / इस दीवाली

छोटी कविता / इस दीवाली
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तुम हमें यूँ ही याद करते रहना,
कहीं न भूल न जाएँ हम तुमको !
ग़म हमें यूँ ही याद करता रहे,
कहीं न भूल न जाएँ हम ग़म को !
मुबारकवाद है, रस्मे-दुनिया,
याद करता है कौन, वर्ना हमको,
कहीं हम भूल न जाएँ तुमको,
याद तुम कर लिया करना हमको !
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November 06, 2018

आज की कविता / खुशबू

मैं हवा की तरह आया था,
मैं हवा सा लौट जाऊंगा,
तेरी साँसों से तेरे दिल में,
मैं चुपके से उतर जाऊंगा।
नज़र आऊंगा मैं हर तरफ,
लेकिन न देख पाओगे,
हर तरफ क्योंकि मैं तब,
खुशबू सा बिखर जाऊंगा। 
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