June 25, 2017

Karolina Goswami : India in Details.

Let us find out.

For long, questions have been asked about the behavior of foreign media on India. In this documentary, the globe citizens will be seeing what their country's media purposely has been hiding from them. Let's analyse the role of foreign media on India. After all, why the mainstream international media does not give enough coverage to the brighter or the developed side of India? Karolina Goswami is finding the facts.
It's time that the globe citizens stand by the truth and fairness.
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June 24, 2017

राम-माहात्म्य

राम-माहात्म्य
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एक राम दशरथ का बेटा,
एक राम घट-घट में बैठा,
एक राम का सकल पसारा,
एक राम सब जग से न्यारा,
एक राम फिर भी जगजीवन,
एक राम जगजीवनराम,
एक राम जगजीवन-बेटी
दूजे राम विरुद्ध की पार्टी,
एक राम भाजपा-विरोध,
एक राम भाजपा-पक्ष,
एक राम जनता-जनार्दन,
एक राम सत्ता सरकार,
एक राम जन-जन-आधार,
एक निरंजन निराकार,
एक राम न शून्य न एक,
एक राम लेकिन अनेक,
एक राम के भरोसे देश,
एक राम ही जगत-वेश ....
....
चलते-चलते ...
बहरहाल, अयोध्या के राम तो देश / सरकार / न्यायालय के भरोसे ही हैं !
उनका तो उन्हें न माननेवालों, उनकी जन्म-भूमि पर अपने मत का भवन / स्थल (बाबरी मस्जिद) बनानेवालों तक से कोई झगड़ा नहीं है !
वे तो बस तमाशा देख रहे हैं ....!
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ज़ाहिद शराब पीने दे मसजिद में बैठकर
या वो जगह बता जहाँ पर ख़ुदा न हो !
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बनाने दे मुझे मसजिद मंदिर को तोड़कर,
या वो जगह बता जहाँ पर न राम हो !
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June 10, 2017

प्रतिनिधि कविता


प्रतिनिधि कविता
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क्या कविता मूलतः व्यक्ति और समाज के परस्पर द्वन्द्व से मुक्त नहीं हो सकती? यदि कविता किसी के पक्ष या विपक्ष की तुरही है, (और यहाँ पक्ष कवि का अपना ’सत्य’ भी हो सकता है -इससे इनकार नहीं), तो क्या वह ’मौलिक’ हो सकती है? क्योंकि किसी भी पक्ष या विपक्ष में होना चाहे वह कितना भी न्यायसंगत क्यों न प्रतीत हो, केवल प्रतिक्रिया होता है न कि प्रत्यक्ष संवेदन । पिकासो या हुसैन की कृतियाँ केवल प्रतिक्रियाएँ हैं, वॉन गॉग या राजा रवि वर्मा की कृतियाँ मौलिक सृजन है, जो किसी के पक्ष-विपक्ष में न होकर अन्तःस्फूर्त संवेदन की अभिव्यक्ति है, जो कोई ’निर्णय’ नहीं सुनाती, बस अपने संवेदन को यथासंभव शुद्ध रूप में अभिव्यक्त करता है ।
क्या कविता केवल व्यक्ति के संवेदन की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती जिसमें समाज केवल जीवन का एक अमूर्त अनिवार्य तत्व हो, न कि पक्ष या विपक्ष जिसमें व्यक्ति को उससे अलग देखा जाता हो?
कविता या कला के किसी उद्देश्य, आदर्श से प्रेरित और प्रतिबद्ध होते ही क्या वह व्यवस्था का एक यन्त्र नहीं बन जाती है और भले ही वह ’व्यवस्था’ को बदलने का आग्रह करती, ’व्यवस्था’ पर कठोर प्रहार करती दिखलाई देती हो, बल-युग्म (couple of forces) के विपरीत दिखाई देनेवाले दो बलों में से ही एक बल होती है । तब वास्तव में यह यथास्थिति को बनाए रखने में ही सहायक सिद्ध होती है । व्यवस्था का 'चक्र' इसी से शक्ति पाता  है।  लेकिन जब कला (और कविता) मौलिक और स्वतंत्र होती है तो व्यवस्था से अप्रभावित और अछूती अपने उल्लास में गतिशील होती है।  यह 'व्यवस्था' की सतह हिस्सा नहीं होती। 
'व्यवस्था' है समाज, राजनीति, द्वंद्व, जहाँ मौलिक कला के लिए न तो कोई स्थान हो सकता है, और न इसकी उम्मीद की जा सकती है।   
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June 08, 2017

लिखना

लिखना
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क्या लिखना रोग (disease) या व्यसन (addiction) होता है?
यदि लिखना किसी उद्देश्य का साधन है तो यह मौलिक नहीं हो सकता । तब वह उद्देश्य ही मौलिकता को नष्ट कर देता है । यह उद्देश्य या तो कोई आदर्श या राजनैतिक, सामाजिक लक्ष्य होता है, या व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षा जिसके माध्यम से प्रतिष्ठा, धन, सत्ता / शक्ति को पाने की अभीप्सा लेखक को लिखने हेतु प्रेरित करती है । तब वह अभ्यास से शैली को सुधार-सँवारकर विषय के अनुरूप यद्यपि मोहक, उत्तेजक, भावोद्दीपक, सुन्दर प्रतीत होनेवाला, गंभीर और क्लिष्ट लेखन करने में सिद्धहस्त भी हो सकता है किंतु उसमें मौलिकता कहीं नहीं होती । एक कहानी-लेखक जानने लगता है कि कहानी की बुनियादी शर्त है ’मोड़’ (turn and twist) । क़मोबेश यही बात कविता पर भी लागू हो सकती है । ’चौंकाना’ या भावुकता के अतिरेक से किसी को प्रभावित करना न तो कला है, न साहित्य । दुर्भाग्य से आज का अधिकांश लेखन इसी प्रकार का है । और यह किसी भी भाषा के साथ हो रहा है । मौलिकता का एक उदाहरण है ’copyrighting’ जिसमें किसी ’विचार’ को किसी उत्पाद के प्रचार के लिए ’निर्मित’ और प्रयुक्त किया जाता है किंतु वहाँ भी मौलिकता बिकाऊ होती है जो शायद और अधिक अनैतिक, बुरा / गलत है । यहाँ तक कि वह शायद प्रतिभा का दुरुपयोग है । यही बात संगीत, चित्रकला, मूर्तिकला आदि पर भी लागू होती है । कला जब ’उपभोग’ की वस्तु (consumer good commodity) हो जाती है तो उसमें मौलिकता का तत्व वैसे भी गौण हो जाता है ।
दो दिन पहले मैं you tube पर Rajya Sabha T.V. का video 'Special Report' 'गुमनाम है कोई-  भाग 1 तथा 2) देख रहा था जिसमें फ़िल्मों के संगीतकारों की कृतियों का प्रदर्शन किया गया था । अवश्य ही बहुत श्रम के साथ उन्होंने ’संगीत’ को नई ऊँचाइयाँ दीं । एक विशेषज्ञ भारतीय संगीत के ’linear’ तथा पाश्चात्य संगीत के ’harmonic’ होने के अंतर को स्पष्ट कर रहे थे ।
यह ठीक है कि प्रयोग के द्वारा संगीत-रचनाओं (compositions) में ’नए’ प्रभाव लाए जा सकते हैं और उस स्तर पर कलाकारों की प्रतिभा का सम्मान भी होना चाहिए, किंतु क्या उसमें ’मौलिकता’ है?
यही प्रश्न ’लिखने’ पर भी लागू होता है ।
क्या कहानी, कविता या उपन्यास, फ़िल्म, पैंटिंग, स्कल्पचर (शिल्प) पहले अमूर्त रूप में रचनाकार के हृदय / मस्तिष्क में ही नहीं होते जो अभिव्यक्त होने के लिए आतुर होते हैं? क्या गुरुदत्त ने  किसी 'लक्ष्य' को लेकर फिल्में बनाईं ? लक्ष्य तो बाद में समीक्षकों द्वारा आरोपित कर दिए जाते हैं  । मौलिकता किसी समीक्षा या लक्ष्य की मोहताज़ नहीं होती । यहाँ तक कि 'लक्ष्य' और 'समीक्षा' से रचना को प्रभावित होने देना तक सृजन का विपर्यय है  ।
क्या यही बात 'लिखने' पर भी नहीं लागू होती ?   
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May 31, 2017

लक़ीरें

लक़ीरें
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वो लक़ीरें उम्र की,
ये लक़ीरें हाथ की,
जो बिताईं साथ हमने,
यादें वो साथ-साथ की!
उन लक़ीरों में लिखी वो,
दास्तानें बीत चुकीं,
इन लक़ीरों में लिखी हैं,
आनेवाले कुछ दिनों की,
उनमें हमने जो किया,
इनमें जो अब हम करेंगे,
वो झुर्रियाँ माथे की तो,
ये सलवटें अहसास की,
पगडंडियाँ दस्तूरे-राह,
पटरियाँ वो लीक सी,
ये उड़ते पंछी का सफ़र,
ये पंछी की परवाज़ सी,
आहटें फ़ुसफ़ुसाहटें,
अंदेशे फ़िक्रो- ख़याल,
हँसी, ये मुस्कुराहटें,
बेतक़ल्लुफ़ दिल का हाल,
वो लक़ीरें उम्र की,
ये लक़ीरें हाथ की,
जो बिताईं साथ हमने,
यादें वो साथ-साथ कीं!
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अभी-अभी अफ़गानिस्तान में जर्मन दूतावास के प्रवेश-द्वार के निकट हुए कार-बम विस्फोट की खबर पढ़ने के बाद ये लक़ीरें लिख रहा हूँ :
वो लक़ीरें इबादत की,
क़िताबों की, मज़हब की,
वफ़ा की, प्यार की,
इंसाफ़ और ईमान की,
ये लक़ीरें खून की,
आँसुओं की, अश्क़ों की,
शक़ो-शुबहा, ग़ुस्से की,
रंजो-ग़म अफ़सोस की ...!
वो लक़ीरें, ये लक़ीरें ...!
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May 21, 2017

अमूर्त / Abstract रिश्ते

अमूर्त / Abstract
रिश्ते
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किसी भी रिश्ते की हदें होती हैं और रिश्ते को परिभाषित करना तो मुश्क़िल है और शायद व्यर्थ की क़ोशिश भी है किंतु रिश्ता कोई भी हो, अपनी हदें ख़ुद ही तय कर लेता है । उन हदों के भीतर उन्हें निभाना तक़लीफ़देह या आरामदेह हो या न हो, उन रिश्तों के टूटने या ख़त्म हो जाने पर भी दुःखी नहीं करता और अग़र करता भी हो तो उससे किसी से शिक़ायत तो होती ही नहीं ।
यह बात न सिर्फ़ पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक या किसी क्षेत्र-विशेष जैसे व्यवसाय, उद्योग, शिक्षा आदि में हमारे पारस्परिक संबंधों की स्थिति को हमारे लिए स्पष्ट होने में सहायक है, इससे ग़लतफ़हमियों या मतभेदों की वज़ह से रिश्तों के टूटने या ख़त्म होने की आशंका को भी कम किया जा सकता है ।
लेकिन क्या रिश्ते / रिश्तों की अहमियत सिर्फ़ दूसरे इंसानों से हमारे संपर्क होने / जुड़ने तक ही सीमित है? क्या हम ज़िन्दगी के हर पल निरंतर संसार से संपर्क में नहीं होते? बस फ़र्क़ यह है कि जो चीज़ें हमें अधिक महत्वपूर्ण प्रतीत होती हैं उनसे हम अपना अधिक जुड़ाव महसूस करते हैं । किंतु क्या उन तमाम चीज़ों से भी अधिक हमारीनिकटता अपने ही ख़यालों, डरों, उम्मीदों, भविष्य की कल्पनाओं, अतीत की खट्टी-मीठी, कटु या तिक्त स्मृतियों से नहीं होती? एक रिश्ता जिसे हम अभी सबसे ख़ास समझते हैं उसे ही, किसी दूसरे रिश्ते की याद आते ही अचानक व्यर्थ का जंजाल या सेन्टीमेन्टेलिटी / कोरी भावुकता समझकर क्या दरक़िनार नहीं कर देते?
रिश्तों की राह कहाँ से है और कहाँ तक है यह समझने पर हम किसी रिश्ते के साथ अन्याय नहीं करते । हालाँकि यह बहुत मुश्किल है लेकिन ज़रूरी भी तो है ।
और उन रिश्तों के बारे में क्या जो अमूर्त / Abstract होते हैं? जैसे कला, कविता, संगीत, और सबसे बढ़कर ‘उससे’ जिसे हम ’सत्य’, ‘भगवान’, ’प्रेम’ और ’जीवन’ कहते हैं?
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May 19, 2017

Redemption Song by Chris Cornell

विमोचन-गीत
(क्रिस कॉर्नेल)
 "रिडेम्प्शन-सॉङ्ग"
हिंदी अनुवाद -विनय कुमार वैद्य
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एक मकड़जाल दोपहर बाद,
रिक्ततापूर्ण कमरे में
मैं बिना किसी दबाव के स्वीकार करता हूँ,
कि मैं मृत्यु से भरी,
क़िताब के पृष्ठों में खोया हुआ था,
कि कैसे हम अकेले मरेंगे -यह पढ़ते हुए,
और अग़र हम अच्छे हैं,
तो हमें शान्ति में विश्रान्ति दी जाएगी,
कहीं भी, जहाँ भी हम जाना चाहते हों वहाँ ।

मैं चाहता हूँ तुम्हारे घर में होना,
एक के बाद दूसरे कमरे में,
मैं वहाँ तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा,
पत्थर की प्रतिमा की तरह,
मैं वहाँ तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा,
अकेला नितान्त ।

और अपनी मृत्युशैया पर मैं प्रार्थना करूँगा,
देवताओं और देवदूतों से,
किसी पैगन की भाँति किसी से भी,
जो मुझे स्वर्ग ले जाए,
एक ऐसी जगह जो मुझे याद हो,
कि वहाँ मैं सुदूर अतीत में था,
जहाँ आसमान को खरोंचें लगी थीं,
और मदिरा रक्त थी,
और वहाँ तुम मुझे ले गए थे।

मैं चाहता हूँ तुम्हारे घर में होना,
एक के बाद दूसरे कमरे में,
मैं वहाँ तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा,
पत्थर की प्रतिमा की तरह,
मैं वहाँ तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा,
अकेला नितान्त ।

और वहीं मैं तब तक पढ़ता रहा था,
जब तक कि दिन ढल चुका था,
और मैं खिन्न-मन बैठा रहा,
उस सबके लिए जिसे मैंने किया,
उस सबके लिए जिसे मैंने आशीष दिए,
और उस सबके लिए,
जिसे मैं ठीक से न समझ सका,
मेरी मृत्यु होने तक,
भटकता रहूँगा स्वप्नों में,

मैं चाहता हूँ तुम्हारे घर में होना,
एक के बाद दूसरे कमरे में,
मैं वहाँ तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा,
पत्थर की प्रतिमा की तरह,
मैं वहाँ तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा,
अकेला नितान्त ।
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And the original song in English :
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On a cobweb afternoon
In a room full of emptiness
By a freeway I confess
I was lost in the pages
Of a book full of death
Reading how we'll die alone
And if we're good we'll lay to rest
Anywhere we want to go

In your house I long to be
Room by room patiently
I'll wait for you there
Like a stone
I'll wait for you there
Alone

And on my deathbed I will pray
To the gods and the angels
Like a pagan to anyone
Who will take me to heaven
To a place I recall
I was there so long ago
The sky was bruised
The wine was bled
And there you led me on

In your house I long to be
Room by room patiently
I'll wait for you there
Like a stone
I'll wait for you there
Alone, alone

And on I read
Until the day was gone
And I sat in regret
Of all the things I've done
For all that I've blessed
And all that I've wronged
In dreams until my death
I will wander on

In your house I long to be
Room by room patiently
I'll wait for you there
Like a stone
I'll wait for you there
Alone, alone
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December 19, 2016

आज की कविता / मीनाक्षी

आज की कविता / मीनाक्षी
(प्रथम दो पँक्तियाँ 18 दिसम्बर 2014 को लिखीं थीं)
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जो दिख रहा है, सो दुःख रहा है,
.... हाँ, हाँ, मैंने भी बहुत सहा है !
पर मैं आँखें बन्द नहीं कर सकता / सकती,
क्योंकि मेरी पलकें नहीं है !
इसलिए मुझे सिर्फ़ वही दिखाई देता है,
जो मैं देखना चाहता / चाहती हूँ ।
मछुआरे का जाल,
मच्छीमार की बंसी,
किंगफ़िशर की डुबकी,
मैं नहीं देख पाता / पाती,
क्योंकि मेरी पलकें नहीं है !
और मुझे सिर्फ़ वही दिखाई देता है,
जो मैं देखना चाहता / चाहती हूँ ।
हाँ !
और मैं आँखें खुली रखकर भी,
सो सकता / सकती हूँ,
तमाम घटाटोप में,
तमाम ख़तरों के बीच भी,
सुक़ून से !
क्योंकि मेरी पलकें नहीं है !
और मुझे सिर्फ़ वही दिखाई देता है,
जो मैं देखना चाहता / चाहती हूँ ।
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विनय वैद्य / 19/12/2016.

December 16, 2016

मुक्त-प्रेम / दिसंबर 2015

मुक्त-प्रेम / दिसंबर 2015
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कविता, जो दिसंबर 2015 में लिखी थी,
आज अचानक याद आई,
एक साल बाद !
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पगडंडियाँ सी टीलों पर !

December 07, 2016

आज की कविता / खेल

आज की कविता
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खेल
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तुम्हारे चश्मे का रंग,
दूसरों के चश्मों के रंग से,
मेल नहीं खाता,
तुम्हारे चश्मे का रंग,
वक़्त के चश्मों के रंग से,
मेल नहीं खाता,
लोग बदलते रहते हैं चश्मे,
कोई भी उनकी आँखों के रंग से,
मेल नहीं खाता,


कोई भी वक़्त के चश्मों के रंग से,
मेल नहीं खाता,
वक़्त खुद बदलता रहता है चश्मे,
कोई भी उसकी आँखों के रंग से,
मेल नहीं खाता,
किसने देखा है कभी,
वक़्त की आँखों में,
आँखें डालकर?
हर रंग जुदा है,
हर रंग अजनबी भी,
मुझे अजनबी होने का,
यह खेल नहीं भाता !
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देवास /०७/१२/२०१६ १०:२५ a.m.