August 11, 2019

Pakistan Occupied Kashmir

राजनीतिक इच्छा-शक्ति 
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देश के प्रथम प्रधान-मंत्री ने एक भयंकर भूल तब की थी जब बिना मंत्रिपरिषद की सलाह लिए, -बिना विपक्ष और संसद को विश्वास में लिए ही, पाकिस्तान की फौज द्वारा कबाइली हमले से भारतीय भूमि पर नाजायज़ कब्ज़ा कर लेने के बाद कश्मीर मामले को अनावश्यक रूप से यू.एन. में ले गए थे।
अब एक सुखद और शक्तिशाली सुझाव श्री सुब्रह्मण्यन स्वामी ने रखा है कि भारत, प्रथम प्रधानमंत्री श्री नेहरू द्वारा दाख़िल किए गए उस पिटीशन को विद्ड्रॉ कर इस पूरे प्रकरण को समाप्त कर सकता है !
और अभी श्री नरेंद्र मोदीजी के तेवर देखकर यह कार्य नामुमकिन नहीं लगता।
मोदी है तो मुमकिन है !
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पूरा कश्मीर हमारा है !    

August 06, 2019

देर आयद दुरुस्त आयद !

अन्ततः 
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सँभाल कर के रखी तौ पाएमाल हुई,
सड़क पे फ़ेंक दी तो ज़िन्दगी निहाल हुई ।
(स्व. दुष्यन्त कुमार)
अगर चाहती तो पहले की सरकार ज़रूर इसका श्रेय ले सकती थी, ...
अच्छा हुआ सरकार ने देशहित में धारा 370 को अन्ततः क़ुर्बान कर ही दिया !
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July 29, 2019

दिल्ली या देहली ?

नाम क्या है?
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संस्कृत भाषा में ’दिलीप’ श्रीराम के कुल में पैदा हुए रघुवंश के एक राजा का नाम था,
जो राजा रघु के पिता थे ।
जैसे महीप का अर्थ महीपति होता है, वैसे ही दिलीप का अर्थ दिलीपति है,
जो दलपति का प्रचलित रूप है।
इसे दलीयपति के रूप में भी देखा जा सकता है।
दलीयपति का प्रचलित संक्षिप्त रूप आगे चलकर 'दलीय' और फिर संभवतः,
'दलीय' से दिल्ली हुआ हो।   
नृप का अर्थ नृपति अर्थात् राजा होता है ।
दिल्ली का मूल नाम अतीत में,
राजा दिलीप की राजधानी के नाम के आधार पर ’दिलीपपुर’ रहा होगा,
क्योंकि राजा दिलीप की राजधानी तो अयोध्या थी ।
इससे हमें दिल्ली का नाम दिलीपपुर करने के लिए एक और ठोस आधार प्राप्त हो सकता है ।
अगर रामलला अयोध्या में हैं, तो दिल्ली दिलीपपुर क्यों नहीं हो सकता ?
संस्कृत में 'देहली' का अर्थ है : 'दहलीज' या देहरी।
इस प्रकार दिल्ली देश का प्रवेश-द्वार तो है ही।
इसे अंग्रेज़ी में 'Delhi' जाने से भी यह अनुमान लगाया जा सकता है कि 'देहली' ही आगे चलकर दिल्ली और अंग्रेज़ी में 'Delhi' के रूप में प्रचलित हुआ होगा।
दिल्ली या देहली ? 
इसलिए अगर इसका नाम बदलकर 'देहली' रखा भी जाता है तो,
अंग्रेज़ी में इसे,
 'Delhi' लिखे जाने के बजाय  'Dehli' या 'Dehali' के रूप में लिखा जा सकता है।
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July 27, 2019

मन की बात ...

सब का साथ, सबका विकास,
सब का विश्वास,  .... !
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जब एक दिन ब्लॉग लिखने का ख़याल आया तो लगा कि मेरे जैसे औसत आदमी के लिए 'मन की बात' कहने के लिए यह अच्छा प्लेटफॉर्म है।  अपनी बात लिख दो, जिसे पढ़ना हो पढ़े, न पढ़ना हो न पढ़े। उस दिन से आज तक कभी इसका महत्व नहीं प्रतीत हुआ कि कितने लोग इसे पढ़ते या पढ़ना पसंद करते होंगे।
वैसे भगवान की कृपा से जिंदगी जैसे-तैसे चल रही है, बाकी भी कट जाए दुआ कीजै !
औसत आदमी होने का फ़ायदा यह भी है कि आप दूसरों की चिंताओं, परेशानियों, समस्याओं की फ़िक्र करना छोड़ देते हैं।  क्योंकि फ़िक्र करने का तभी कोई मतलब है जब आप उन चिंताओं, परेशानियों, समस्याओं को दूर करने के लिए कुछ कर सकें। बेवजह फ़िक्र करने के लिए वक़्त और इतनी फ़ुर्सत भी ज़रूरी है जो औसत ('आम' नहीं; क्योंकि 'आम' से मुझे आम आदमी पार्टी वाला 'आम' याद आता है और ग़लतफ़हमी न हो, इसलिए मैं 'औसत' शब्द इस्तेमाल करता हूँ।) वैसे ही 'आप' से भी मुझे वही 'आप' याद आता है जो 'आम आदमी पार्टी' का संक्षिप्त नाम है।
फिर मुझे शक होता है कि क्या 'सब' का वही मतलब होता है जो मतलब 'औसत' ('आम' नहीं) का होता है?
क्या 'सब' और 'औसत' समानार्थी हैं ? क्या 'सब का साथ, सबका विकास, ...सब का विश्वास, सबका .... !' का वही मतलब है जो कि 'हर-एक और प्रत्येक का साथ, हर-एक और प्रत्येक का विकास और हर-एक और प्रत्येक का विश्वास' का हो सकता है?
लेकिन, 'सब' तथा 'हर-एक और प्रत्येक' की प्रधान-मंत्री जैसे अति विशिष्ट और महत्वपूर्ण पद पर आसीन व्यक्ति से यह अपेक्षा होना भी बिलकुल स्वाभाविक है कि वह 'सब' तथा 'हर-एक और प्रत्येक' के बीच सही संतुलन स्थापित करने की भरसक कोशिश करे ।
इसमें शक नहीं कि यह एक बहुत कठिन और दुःसाध्य कार्य है किन्तु प्रधान-मंत्री के पास जनता द्वारा दी गईं जितनी शक्तियाँ हैं उनसे उनके लिए यह असंभव नहीं है। लेकिन इसके लिए उनके पास वक़्त की पाबंदी तो होती ही है, और 'फ़ुर्सत' तो उनके शब्दकोश से भी नदारद होता होगा।
(हालाँकि उनसे मेरी तुलना का सवाल ही नहीं, और यह भी सच है कि मेरे पास बहुत वक़्त और फ़ुर्सत भी है, लेकिन मेरी इतनी ताक़त कहाँ कि अपनी खुद की ही जिंदगी को भी ठीक से पटरी पर ला सकूँ !)   
शायद इसीलिए यह उक्ति फ़ेमस (वायरल) हुई होगी :
"मोदी है तो मुमक़िन है।"
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July 20, 2019

सवाल यह है कि ...

क्या मुसलमान मोदी पर यक़ीन करते हैं ?
क्या मुसलमानों को डरा रहे हैं ओवैसी ?
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सवाल यह नहीं है, कि मुसलमानों को मोदी पर यक़ीन है या नहीं,
सवाल यह है कि जब तक क़ुरान और इस्लाम में,
इस्लाम को न माननेवालों के लिए और उनसे संबंधित :
जिहाद, जज़िया, काफ़िर, दार-उल-हर्ब, धिम्मी,
जैसे घृणासूचक, अपमानजनक और निन्दात्मक शब्द मौजूद हैं,
तब तक सिर्फ़ हिन्दू ही नहीं, दूसरे सभी ग़ैर-मुस्लिम भी,
-मुसलमानों और इस्लाम की नीयत और इरादों पर कैसे यक़ीन कर सकते हैं ?
यही है शक की बुनियाद। इसलिए यह शक बेवजह तो नहीं है, और ज़्यादा अच्छा तो यही होगा कि इस्लाम और मुसलमान यह मौक़ा ही न आने दें कि उन्हें कोई आरोपों / शक के कटघरे में खड़ा भी कर सके ।  
लेकिन सिर्फ़ भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में आज यह सवाल उठने लगा है ।
जब तक आतंकवाद की बुनियाद क्या है यह तय नहीं किया जाता, आतंकवाद का संबंध किसी धर्म-विशेष से है या नहीं, यह भी तय नहीं हो सकता । इसलिए आतंकवाद का सामना भी तब तक असरदार तरीके से नहीं किया जा सकता । यही बुनियादी सवाल मुसलमानों (की नीयत और इरादों) पर सच्चा या झूठा शक पैदा होने की सबसे बड़ी वज़ह है, जिसे दूर किए जाने की जवाबदारी और ज़्यादा ज़रूरत भी सिर्फ़ इस्लाम की, और सिर्फ़   मुसलमानों की ही है । यह भी हो सकता है कि यह शक पूरी तरह बिलकुल ग़ैर-वाज़िब और बेबुनियाद हो, लेकिन इसे मिटाए जाने पर ही यह मुद्दा हमेशा के लिए हल हो सकता है। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक यह मुद्दा उछाला जाता रहेगा।  कुछ देर के लिए अगर यह भी मान लिया जाए कि किसी दिन पूरी दुनिया इस्लाम के परचम तले आ जाएगी, -तो भी, क्या गारंटी है कि इसके बाद इस्लाम की अलग अलग व्याख्या करने वालों के बीच के आपसी सभी मतभेद और संघर्ष समाप्त हो जाएँगे ? क्या आज भी इस्लाम की अलग-अलग व्याख्याओं के बीच टकराहट नहीं है?
इसलिए यह सिर्फ इस्लाम के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के हित में ज़रूरी है कि इस शक को सही तरीके से मिटाया जाए।  जब तक ऐसा नहीं होता तब तक दूसरों के न चाहते हुए भी कुछ न कुछ लोग आतंकवाद को इस्लाम से जोड़कर देखते रहेंगे। और न चाहते हुए भी इसका हर्ज़ाना सभी को भुगतना पडेगा। 
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पहले बहुत बार सोचा कि इस पोस्ट को प्रकाशित न करूँ, फिर लगा कि ऐसा करना डर की वजह से अपने कर्तव्य की उपेक्षा करने जैसा और दूसरों से उनका 'जानने का' हक़ छीनने जैसा भी होगा, इसलिए अब अंततः प्रस्तुत है।
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July 14, 2019

स्वस्तिवाचन

अमेरिकी संसद में संस्कृत 
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इस वीडियो में दो हिस्से हैं।
आशा है यह आपको ज़रूर पसंद आएगा।
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असतो मा सद्गमय।।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।। 
मृत्योर्माऽमृतं गमय।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः  ।।
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July 13, 2019

Thought-Process

विचार-विधान / विचार-प्रवाह
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अभिनेत्री पायल रोहतगी अपने विडिओ में 'Thought-Process' शब्द का प्रयोग अक्सर करती हैं।
ज़ाहिर है कि इस दौरान 'Thought-Process' का सहारा और इस्तेमाल तब भी ज़रूरी होता है, जब कोई  बिना इस शब्द को बोले भी अपनी बात कहता है ।
जिन विषयों पर वे अपने विचार व्यक्त करती हैं उनमें से अधिकाँश में मेरी दिलचस्पी नहीं है क्योंकि फिल्मों या फ़िल्म-टीवी आदि से मेरा संबंध बरसों से टूट चुका है। फ़िल्म-टीवी आदि जिन मुद्दों को अपनी गतिविधियों में महत्व देते हैं उनमें मेरी दिलचस्पी उतनी ही होती है जितनी सुबह के अख़बार में हो सकती है।
अख़बार में जैसे केवल हेड-लाइन्स, 'उठावना' / शोक-समाचार और editorials ही देखता हूँ, और लगभग सभी विज्ञापनों को नज़र-अंदाज़ कर देता हूँ मेरा वैसा ही व्यवहार नेट पर देखे जानेवाले न्यूज़-चैनल्स के साथ भी होता है। मेरी रुचि ब्लॉग लिखने / पढ़ने में, debates देखने-सुनने में अधिक है। ऐसा करना शायद मेरे लिए मेरे  मनोरंजन का ज़रिया भी हो सकता है। यद्यपि स्वयं मुझे किसी debate में भाग लेना पसंद नहीं।         
हर कोई वैसे तो केवल अपनी रुचि, ज़रूरत और काम की वेब-साइट्स गम्भीरतापूर्वक देखता है लेकिन कभी-कभी केवल कौतूहलवश भी ऐसी साइट्स चेक कर लेता है जहाँ उसे सीखने या जानने के लिए कुछ नया मिलने की संभावना दिखाई दे जाती है। इसीलिए कभी-कभी कुछ अलग भी देख लेता हूँ।
यही विचार-प्रक्रिया (Thought-Process) प्रायः आदतन हर किसी की होती है।
लेकिन इससे अधिक रोचक यह है कि हर किसी की विचार-प्रक्रिया (Thought-Process) किन्हीं सुनिश्चित विश्वासों, मान्यताओं, प्रयोजनों और आग्रहों की लीक से बँधे होते है। वे विश्वास, मान्यताएँ, आग्रह जिन पर वह और समाज भी 'धर्म' शब्द की मुहर लगाता है, 'धर्म' शब्द का आवरण चढ़ाता या लेबल लगाता है।    
यह भी कुछ कम आश्चर्यजनक नहीं है।
और इसी के चलते जहाँ लब्धप्रतिष्ठ या लुब्ध-प्रतिष्ठा बुद्धिजीवी / राजनीतिक पत्रकार अनेक विषयों पर न केवल भिन्न-भिन्न विषयों पर भिन्न-भिन्न विचार-विधानों, विचार-प्रवाहों और विचार-प्रक्रियाओं की एक-दूसरे से बहुत अलग अलग नदियों में नौकायन (navigation) करते हैं, वहीं उनके व्यक्तित्व की जटिलता, विषमता, रूढ़ता और दुरूहता स्वयं उन्हें ही, इस प्रकार दूसरों से अधिक भ्रमित किए रखती है ।
विचार-विधान (thought-structure) अपनी अपनी जानकारी, भाषा, और तर्कबुद्धि की मर्यादा से तय होता है, तो विचार-प्रवाह की दिशा अपने हितों, आशंकाओं, आकांक्षाओं और आशा-निराशाओं से तय होती है।
विचार-प्रवाह की नदी इन्हीं दो तटों के बीच बहती है जिसकी धारा में अनेक द्वीप ही नहीं अनेक दलदल या भँवर भी होते हैं। और एक ही नदी में परस्पर विरोधी, समानान्तर या विसंगत अनेक प्रवाह भी होते हैं।
जब तक दूसरों से किसी विषय पर विचारों का आदान-प्रदान होता रहता है तब तक वस्तुतः कोई संवाद घटित ही नहीं हो पाता। और हमें कभी ख़ुशी कभी ग़म वाली स्थिति का सामना करना पड़ता है।  कभी तसल्ली या आशा-निराशा भी हाथ लगती है, कभी-कभी मन उचट या ऊब जाता है लेकिन नौकायन (navigation) का मोह हमें अपनी पकड़ से छोड़ता नहीं।
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July 12, 2019

Organized Religion.

संगठित धर्म 
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वैसे तो प्रचलित अर्थ में जिसे हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं में 'धर्म' कहा जाता, माना तथा समझा जाता है, उस 'Religion' की वास्तव में 'सनातन-धर्म' से कोई तुलना ही नहीं की जा सकती, क्योंकि 'सनातन धर्म' किसी परंपरा, मान्यता या विश्वास का नाम नहीं है।
फिर भी अनेक कारणों से हम उस अर्थ को ढो रहे हैं और ऐसे अनेक तथाकथित 'धर्मों' / religions के बीच सामञ्जस्य स्थापित करने का कठोर श्रम और विफल प्रयत्न करने में जी-जान से लगे हुए हैं। यह नितांत और सर्वथा असंभव कार्य भी है, इसलिए चाहकर या न चाहते हुए भी हम इसमें कभी सफल नहीं हो सकते।
अपने-आपको हिन्दू, मुसलमान, पारसी, सिख, यहूदी या ईसाई मान लेने से कोई हिन्दू, मुसलमान, पारसी, सिख, यहूदी या ईसाई नहीं हो सकता क्योंकि हिन्दू, मुसलमान, पारसी, सिख, यहूदी या ईसाई होना केवल एक वैचारिक मान्यता है न कि ऐसा वास्तविक भौतिक यथार्थ जिसे किसी वैज्ञानिक कसौटी पार कसकर प्रमाणित किया जा सके।
किन्तु चूँकि राजनीति धर्म के बहाने हर मनुष्य को उसका अपना यूटोपिया चुनने का ख़याल देती है, अतः ऐसे अनेक धर्म धरती पर विद्यमान हैं जो परस्पर स्पर्धा में होते हैं।  और ऐसा प्रत्येक धर्म आशा करता है, अंततः एकमात्र वही विश्वविजयी होगा। जबकि सबसे बड़ी विसंगति और विडम्बना यही है कि इनमें से कोई भी धर्म किसी ऐसी स्थिर और ठोस बुनियाद पर खड़ा नहीं होता जो क्षण क्षण दरकती, बिखरती, टूटती और क्षरित न होती रहती हो। अपने-अपने यूटोपिया के अंतर्गत हर मनुष्य अपने आपको किसी छोटे या बड़े धर्म से जोड़ कर अपने समूह की सुरक्षा, विस्तार और दूसरों को पराजित करने की आकांक्षा से भरा हुआ, डरा हुआ और हारा हुआ है। यद्यपि समूह से जुड़ने में तात्कालिक तौर से शक्ति और सुरक्षा प्राप्त होती प्रतीत होती है किन्तु पलक झपकते ही वही भय और असुरक्षा में बदल जाती है।  ज़रूरी नहीं है कि किसी समूह में संगठित होने से आप अधिक शक्तिशाली और सुरक्षित हो ही जाते हों। क्योंकि दूसरे से आपको होनेवाला डर ही तो आपको संगठित होने के लिए प्रेरित करता है।  सरल शब्दों में; - यह भय का अंत नहीं बस समय खरीदने (time borrowing or buying) करने और स्वयं को भ्रमित किए रहने का ही एक तरीका है। अंततः तो आपको जीते-जी पराजित होना ही है, - या क्या आप सोचते हैं कि किसी दिन न किसी आपका धर्म ही अवश्य ही विजयी होगा, और शेष सभी दूसरे मिटकर समाप्त हो जाएँगे ? वैसे भी व्यक्तिगत रूप से तो  अंत में मृत्यु तो हर किसी की अवश्यम्भावी है ही। क्या मनुष्य के रूप में, - न कि हिन्दू, मुसलमान, पारसी, सिख, यहूदी या ईसाई होने मात्र से, आप वाक़ई सुरक्षित और शक्तिशाली, निर्भय और निश्चिन्त हो सकते हैं ? कौन सी सुरक्षा आप खोज रहे हैं? वास्तव में आप परस्पर एक दूसरे से लगातार प्रतिस्पर्धा, आशंका, अविश्वास और डर में जी रहे हैं और सोचते हैं कि किसी वर्ग, जाति, संप्रदाय, धर्म, राष्ट्रीयता से जुड़कर, उससे अपनी अस्मिता को जोड़कर आप इस सबके बीच सुरक्षा और निश्चिंतता पा लेंगे। पूरी मनुष्य जाति की और हर मनुष्य की यह सामूहिक और वैयक्तिक मानसिकता है। और कोई यूटोपिया आपको तब तक इस मानसिकता से मुक्ति नहीं दिला सकता जब तक कि आप इस तथ्य को इसकी पूरी सच्चाई में नहीं देख लेते ।
सवाल किसी से लड़ने और किसी धर्म से जुड़कर संगठित होने का नहीं, बल्कि यह समझने का है कि किस प्रकार से मनुष्यमात्र में भय और असुरक्षा की भावना जन्म लेती है, और कोई भी धर्म क्या उसे इस भय और असुरक्षा से उबरने में सहायक होता है? यदि सहायक होता भी है तो किस कीमत पर? और, क्या आप वह कीमत चुकाने को तैयार हैं ?  
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July 07, 2019

साहस, दुस्साहस और निर्भयता

किंकर्तव्यविमूढ 
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मनुष्य (का मन) बँटा हुआ (विखंडित) है।
मनुष्य चाहे किसी भी देश, स्थान का हो, किसी भी भाषा को प्रयोग करता हो, पुरुष या स्त्री, गरीब या अमीर हो, शिक्षित या अशिक्षित, धार्मिक या अधार्मिक हो, आस्तिक या नास्तिक, सुसंस्कृत या असंस्कृत हो, धर्मगुरु या किसी धर्म का अनुयायी हो, देश या समूह / समाज का नेता हो या आमजन, किंकर्तव्यविमूढ़ है। यह किंकर्तव्य-विमूढता मानव जाति का स्थायी चरित्र है।
अधिकाँश लोगों को लगता है कि संसार को बदला जाना चाहिए, शोषण और अन्याय ख़त्म होना चाहिए और प्रत्येक मनुष्य को सुखी और स्वस्थ होना चाहिए, किन्तु इने-गिने लोग ही सोचते-समझते हैं कि वे समाज को और संसार को बदल सकते हैं। इनमें से कुछ लोग किन्हीं कारणों से इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करने के प्रति इतने अधिक उत्कंठित होते हैं कि अपने तरीके बलपूर्वक भी दूसरों पर थोपने लगते हैं। इसका एक कारण यह भी है कि उनमें से बहुत से, संसार को बदलकर कौन सा रूप दिया जाना है, इस बारे में बहुत स्पष्ट, सुनिश्चित और अत्यंत आश्वस्त होते हैं कि उनका तरीका ही अंततः सफल होगा। यह उनका अति-उत्साह ही होता है जिसे वे स्वयं ही लगातार बनाये रखते हैं।
इसमें सबसे बड़ी विसंगति यही है कि 'संसार' को 'बदलकर' वे उसे जो नया रूप देना चाहते हैं, वह रूप केवल उनकी कल्पना और विचार में ही होता है और कल्पना और विचार सदा अमूर्त होते हैं तथा क्षण-क्षण अपना रूप स्वयं ही बदल लेते हैं। आपकी कल्पना और विचार को कितने लोग जानते हैं? यहाँ तक कि जो कल्पना और विचार आपको एक समय अभिभूत कर लेता है, आकर्षित कर जिसे आप जीवन का एकमात्र ध्येय और प्राप्तव्य समझ बैठते हैं वही पल दो पल बाद स्वप्न सा तिरोहित हो जाता है जिसका कोई चिन्ह तक ढूँढ़ने से भी पुनः नहीं मिल पाता।
इसकी बजाय वे लोग जो 'संसार' को 'बदलने' के किसी स्वप्न से मोहित नहीं होते और किसी स्थूल भौतिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं व्यावहारिक रूप से किसी हद तक अपने आपको कभी-कभी संतुष्ट और शायद 'सुखी' भी अनुभव करने लगते हैं।  हालाँकि यह संतोष और सुख भी क्षणिक होता है किन्तु इससे उन्हें जीवन में निरंतर 'आगे बढ़ते रहने' की प्रेरणा तब तक मिलती रहती है जब तक कोई अप्रत्याशित दुर्घटना या दुर्भाग्य उन्हें झकझोर नहीं देता। इसके बाद वे या तो फिर संभलकर उठ खड़े होते हैं किसी और नए उत्साह (आशा) से भरकर 'आगे बढ़ते रहने' के लिए प्रयत्न करने लगते हैं, या येन-केन-प्रकारेण सुखी-दुखी, चिंतित, निश्चिन्त, परेशान, भयभीत, यहाँ तक कि पागल तक हो जाते हुए अंततः समाप्त हो जाते हैं।
और जो बहुत इने-गिने जीवन में किसी स्तर पर 'सफल' भी हो जाते हैं उनके जीवन में भी एक ऐसा शून्य प्रायः उभर आता है जिसका वे न तो सामना कर पाते हैं, न करना चाहते हैं।  शायद उससे पलायन करने के लिए ही वे 'संसार' को बदलने के किसी प्रकल्प के भागीदार हो जाते हैं।  स्पष्ट है कि यह प्रायः अपने-आपको दी जानेवाली सांत्वना ही अधिक होता है न कि कोई 'साहसिक' संकल्प।
स्थितियाँ असह्य हो जाने पर सहसा साहसी हो जाना, और निर्भयता से स्थितियों का आकलन कर जो किया जाना अपेक्षित है उसे करने के लिए उद्यमशील होना दो परस्पर बहुत भिन्न बातें हैं। किसी आदर्श या धर्म के नाम पर मरने-मिटने या मारने-मिटाने का साहस तो दुस्साहस ही होता है। जबकि स्थिति को उसके यथार्थ स्वरूप में, उसकी सच्चाई में और निर्भयतापूर्वक देखने में, -इसे इस प्रकार से समझने के लिए, जिसमें किसी काल्पनिक आदर्श या धर्म की कोई भूमिका नहीं होती, उसके आकलन से क्या किया जाना अपेक्षित है, जिससे उसका उचित ढंग से सामना किया जा सके, अधिक सामर्थ्य की ज़रूरत होती है।
और प्रायः यह स्थिति से संबंधित प्रश्न और समस्या की व्यापकता से भी तय होता है। समस्या जितनी अधिक या कम व्यापक होगी उसे व्यापकता के उसी स्तर पर देखा जाना ज़रूरी है। किन्तु जब किसी समस्या को उसके व्यापक स्वरूप में देखा जाता है तो उसका कोई ऐसा समाधान ढूँढना प्रायः असंभव ही होता है जो व्यक्तिगत स्तर पर भी सर्वसम्मत हो सके।
इसका एक उदाहरण है धर्म की राजनीति।
पहले तो यही कि 'धर्म' का तात्पर्य प्रत्येक मनुष्य अपने-अपने तरीके से तय करता है इसलिए ऐसा 'धर्म' अनेक प्रकार का अनेक रंग-रूपों में होता है और सामाजिक मान्यता ही होता है। इसलिए जब राजनीति इस विषय में कोई निर्णय करती है तो वह नकारात्मक ही होता है।
किन्तु ऐसे अनेक 'धर्मों' की परस्पर तुलना की जाना और उनके उन तत्वों की खोज करना जो सभी के लिए हानिकारक और घातक हैं और उन्हें प्रतिबंधित किया जाना तो अवश्य ही संभव है। जिन्हें हम रूढ़ि, परंपरा या रिवाज या रस्म कहें उनमें से भी कुछ अवश्य ही ऐसे होते हैं जो पूरे मानव समाज के लिए अन्यायपूर्ण होते हैं और 'धर्म' के आधार पर मनुष्य-मनुष्य में भेद करते हैं।
व्यापकता की दृष्टि से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो कुछ इस्लामी देशों में हिन्दू, बौद्ध यहाँ तक कि यहूदी एवं ईसाई 'धर्म' का आचरण कानूनन अपराध है जबकि इन तीनों धर्मों में प्रकटतः ऐसी कोई शिक्षा नहीं दी जाती है कि इन्हें न माननेवाले को क़त्ल कर दिया जाना धर्मसंगत है। जबकि इस्लाम में अवश्य ही खुले तौर पर ऐसी शिक्षा दी जाती है।
ऐसी स्थिति में यही उचित है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसा
'समान नागरिक क़ानून'
[Universal and Uniform Civil Code],
जो व्यक्ति-व्यक्ति में भेद न करता हो लागू किया जाए, जिस पर किसी 'धर्म' या रूढ़ि, परंपरा या रिवाज या रस्म का वर्चस्व न हो।
'धर्म' की राजनीति करनेवाले इससे असहमत होंगे और इसके विरोध में दलील देंगे। इस प्रकार की दलील वैसे भी राष्ट्र-विरोधी होने से सबके लिए ग्राह्य नहीं होने से अस्वीकार्य ही है।
किसी तथाकथित धर्म-स्थल के स्वामित्व के प्रश्न पर भी इसी दृष्टि से विचार किया जाना चाहिए और इतिहास की भूलों को दुहराया नहीं, उनका निराकरण कर उन्हें सुधारा भी जाना चाहिए।
सवाल बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की बजाय राष्ट्र और मनुष्यमात्र के हितों पर ध्यान देने का है।
सवाल तुष्टिकरण की ऐतिहासिक भूल को दुरुस्त करने का है जिससे भारत राष्ट्र टूटा और पुनः टूटने की कगार पर आ खड़ा हुआ है।
यह समय है इस्लाम नामक धर्म की उन शिक्षाओं पर प्रश्न उठाए जाने का, जिनके कारण अन्य धर्मावलांबियों पर अन्याय होता आया है। तुष्टिकरण की नीति, जिसने इस तुष्टिकरण के बहाने देश के विभिन्न समुदायों में परस्पर अविश्वास, घृणा, वैमनस्य और भय को बढ़ाया।
इसके लिए साहस चाहिए, -न कि दुस्साहस, विवेक चाहिए, -न कि कट्टरता।
जब तक इस्लाम में 'जेहाद', 'काफ़िर वाजिब-उल-क़त्ल', 'जिज़िया', 'धिम्मी', 'दार-उल-इस्लाम', 'दार-उल उलूम', 'दार-उल-हर्ब',  हदूद (ईश-निंदा क़ानून -'Blasphemy' -Law), जैसे शब्द (और आदर्श) हैं, तब तक इस्लाम को दूसरे धर्मों से समान कहना कहाँ तक ठीक है? क्या यह दूसरे धर्मों और मतों का अपमान नहीं है?
इसका यह अर्थ नहीं कि इस्लाम और उस मत के अनुयायियों पर बलपूर्वक उस तरह का प्रतिबन्ध लगा दिया जाए, -प्रतिबन्ध लगा दिया जाए, जैसा कि इस्लामिक देशों में दूसरे मतों पर लगाया गया है ।
बल्कि इससे पहले होना यह चाहिए कि इस्लाम और उसके मतावलंबी स्वयं ही अपने आपका, तथा अपने मत की शिक्षाओं का मानव-मात्र के हित को ध्यान में रखकर मूल्याँकन और आत्मावलोकन करें।
तलाक़ या हलाला जैसे प्रश्न तो अपेक्षाकृत गौण मुद्दे हैं। क्योंकि स्वयं इस्लामी देशों में भी इस बारे में अलग अलग क़ानून हैं।
क्या इस्लाम के विरोध के लिए ज़रूरी है कि हिन्दू या अन्य धर्मावलंबी 'संगठित' हों ही?
क्या इस्लाम या किसी भी मत में हो रहे किसी अन्याय का विरोध करना और उसे दूर करना ही सर्वाधिक ज़रूरी और पर्याप्त नहीं है?
क्योंकि जैसे ही किसी धर्म / मत के नाम पर संगठन बनाया जाता है परस्पर अविश्वास और वैमनस्य ही पैदा होता है जो और भी बढ़ता भी है।
इसलिए यहाँ सभी के लिए यही ठीक है कि राष्ट्रहित में जो उचित है उसे प्रथम स्थान देकर धर्म की राजनीति को बीच में लाए बिना ही परस्पर सौहार्द्रपूर्ण होकर इन प्रश्नों पर गौर करें।
यही वास्तविक साहस है।
यदि हम ऐसा नहीं कर सकते तो लगातार लड़ते-झगड़ते रहेंगे और मरकर जन्नत में जाएँ न जाएँ जीते-जी तो जहन्नुम में ही पड़े रहेंगे।
चलते-चलते :
बहरहाल श्री तुफ़ैल चतुर्वेदी के इस विडिओ को देखने के बाद ही मुझे इसे लिखने की हिम्मत हुई।
पता नहीं मेरा यह पोस्ट धृष्टता है, साहस है, दुस्साहस है या निर्भयता !
लेकिन चूँकि इसे पोस्ट करना मुझे मेरा पावन कर्तव्य और अधिकार भी अनुभव हो रहा है,
इसलिए अंततः अब करने जा  रहा हूँ ताकि अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी का सम्मान कर सकूँ
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July 05, 2019

कुवलयापीड

जहदजहद -जहत्-अजहत्-न्याय 
कुवलयापीड हाथी था, जिसे कंस ने शराब पिलाकर मदमस्त कर श्रीकृष्ण पर आक्रमण करने और मारने के लिए भेजा था ।
क्या यही कुवलयापीड बाद में कुबलाई खान तो नहीं हुआ?
ऐसी ही कथा बौद्ध-साहित्य में भी पाई जाती है जब कुवलयापीड नामक हाथी को भगवान् बुद्ध पर आक्रमण करने के लिए भेजा गया था लेकिन भगवान् बुद्ध के समीप पहुँचते-पहुँचते वह अत्यन्त विनम्र होकर उनके चरणों पर झुक गया ।
इसलिए कुबलाई खान अवश्य ही बौद्ध-सभ्यता से संबद्ध था ।
कुबलाई खान मंगोल-वंश का था और मुसलमान नहीं था यह तो तय है।
सवाल यह भी है कि बाबर मुग़ल अर्थात् मंगोल था लेकिन मुसलमान भी था, न कि बौद्ध।
इतिहास जिस प्रकार स्वयं ही स्वयं को प्रभावित करता है वह भी पुनः एक और इतिहास है।   
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