September 16, 2017

जब कविता बक़वास होती है ...

जब कविता बक़वास होती है
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एक पैग हो जाने के बाद ही,
महफ़िल में उस पर नज़र जा पाती है ।
चौंकानेवाली कुटिल कल्पना से प्रेरित,
किसी आदर्श के प्रति समर्पित,
किसी राजनीतिक ’सरोक़ार’ से ’प्रतिबद्ध’
किसी ’सामाजिक’ दायित्व की पैरोकार,
ब्ल्यू-व्हेल सी, कृपा-कटाक्ष से देखती हुई,
भोली नाज़ुक विषकन्या सी कविता,
आकर्षित कर,
दूर हटा देती है मनुष्य का ध्यान,
अस्तित्व के बुनियादी सवालों से,
और अपनी कृत्रिम सुंदरता के,
मारक अंदाज़ से क्षण भर में ही,
बाल-बुद्धि, अपरिपक्व मानस को,
जकड़ लेती है अपने मोहपाश में,
उस मकड़ी की तरह,
जिसके जाल के अदृश्य तंतु,
फैले हैं दिग्-दिगंत तक !
चूसती रहती है रक्त,
जाल में फँसते कीड़ों का ...
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September 15, 2017

काव्य : कविता और शायरी,

कविता और शायरी
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कविता लिखी जाती है,
शेर पढ़ा जाता है,
लिखे जाने से पहले,
कविता प्रस्फुटित होती है,
पढ़े जाने से पहले,
शेर उछलता है,
उमंग और उल्लास से!
कविता जब प्रस्फुटित होती है,
तो किसी भाषा में नहीं होती,
बस भाव और भावना होती है ।
लेकिन भाषा का सहारा लेते ही,
कोई विशिष्ट रूप ले लेती है,
एक ही भावना और भावना,
अलग-अलग कवि-मन में,
अलग-अलग भाषाओं में,
असंख्य रूप लेती है ।
शेर जब उछलता है,
तो संतुलित होता है,
वज़न को तौलते हुए,
करता है आक्रमण,
अहिंसक, भव्य, स्तब्धकारी,
इसलिए लिखें या पढ़ें,
यह किसी के बस में नहीं,
वे अपनी भंगिमा और मुद्रा,
स्वयं ही तय करते हैं ।
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September 14, 2017

आज की कविता : मयूर और मेघ

आज की कविता : मयूर और मेघ
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हर एक मयूरपंख में,
एक आँख होती है,
सहस्र नेत्रों से देखता है मयूर,
हर मेघ में छिपी सहस्त्र बूँदों को,
हर आँख में एक पुतली होती है,
जैसे कि आँख का हृदय,
गहन, चमकीला, श्यामल,
और उसके चारों ओर हल्का नील,
हरा होता हुआ आकाश,
आकाश से परे,
पृथ्वी के भूरे होते हुए गेरूए रंग,
जिनसे परे,
अरण्य का विस्तार असीमित,
कविता जब जन्मती है,
ऐसे ही किसी केन्द्र से,
जो अरण्य होता है,
जो पृथ्वी होता है,
जो हृदय होता है,
जो आकाश होता है,
जो आँख होता है,
जो नेत्र और हृदय होता है ।
एक ही नेत्र सहस्र होता है,
और मयूर सहस्रनेत्र !
क्या मयूर का होना कविता नहीं है?
क्या ज़रूरी है इसे लिखना?
क्या ज़रूरी है इसे समझना?
क्या अबूझ को समझा जा सकता है?
तो फिर लिखा जाना भी कैसे हो सकता है?
फिर भी कविता लिखी तो जाती ही है,
न भी लिखी जाये तो भी होती तो है ही,
मेघों के छत्र के तले,
अपने छत्र में नाचता मयूर!
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यह हिन्दी-दिवस !

यह हिन्दी-दिवस !
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मुझे हिन्दी मातृभाषा की तरह मिली थी।  स्कूल में हिन्दी माध्यम से पढ़ा, लेकिन अंग्रेज़ी से मुझे न तो वैर था न लगाव। कक्षा नौ में अंग्रेज़ी-विरोध के कारण हमने तय किया कि अंग्रेज़ी का 'पेपर' नहीं देंगे, अर्थात् बहिष्कार करेंगे।  दूसरे दिन मैं परीक्षा के समय घर से तो चला लेकिन स्कूल जाने के बजाय इधर-उधर भटकते हुए दो-तीन घंटे बाद घर पहुँचा। पिताश्री ही स्कूल में प्राचार्य थे और उन्हें कल्पना नहीं थी की मैं ऐसा अनुशासनहीन क़दम उठाऊँगा।  डर भी बहुत लग रहा था।  परीक्षा-परिणाम आने पर मेरी रैंक चौथी थी।  मुझे आश्चर्य हुआ।  फिर जब कक्षाध्यापक का ध्यान इस ओर आकर्षित किया गया कि 'अंग्रेज़ी' की परीक्षा देना-न-देना ऐच्छिक था और उसके मार्क्स जोड़े नहीं जा सकते तब उन्होंने इस भूल को सुधारा।
हिन्दी मेरे लिए घर की दाल-रोटी है, माँ के हाथों की बनी !
दूसरी भाषाएँ मौसी के हाथों के बने व्यञ्जन !
वे भी प्रिय हैं उनसे भी द्वेष नहीं, लेकिन हिंदी-दिवस मनाने का ख्याल ही मुझे गले नहीं उतरता!
एक मित्र ने कविता लिखी :
"मैं हिंदी हूँ !
वेंटीलेटर पर जिंदी हूँ। .. ... ..."
हिंदी के प्रति उसकी भावनाओं पर मुझे खुशी है, लेकिन मेरी दृष्टि में किसी भी भाषा का अपना जीवन होता है, वे जन्म लेती हैं, पनपती और फूलती-फलती, फैलती हैं और बहुत लम्बे समय में इतना बदल जाती हैं कि पहचानना मुश्किल हो जाता है।  हिंदी भी इसका अपवाद नहीं है।
बहरहाल मैंने उसे यह उत्तर दिया :
 
एक प्रश्न :
क्षमा चाहता हूँ, तुक मिलाने के लिये  ’जिंदा’ / ’ज़िन्दा’ को ’जिंदी’ / ’ज़िन्दी’ कर देना शायद ज़रूरी हो, पर ऐसा करने पर हिंदी ’जिंदा’ कैसे रहेगी?
क्या यहीं से हिंदी का विरूपण शुरू नहीं हो जाता?
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यूँ तो आज़ाद परिन्दा हूँ,
लेकिन घायल हूँ, ज़िन्दा हूँ,
तुमने पिंजरे में डाल दिया,
कहते हो मुझको पाल लिया,
तुम जब चाहो प्यासा रक्खो,
भूखा रक्खो या भूल रहो,
याद आए या मन हो तो,
भोजन-पानी तब मुझको दो,
साल में किसी एक दिन तुम,
मना लो मेरा हैप्पी-बड्डे,
देखो घायल या ज़िंदा हूँ,
तो ले जाओ डॉक्टर के पास,
तुम क्या चाहो, मुझे पता है,
तुम्हें चाहिए मान-सम्मान,
तुम्हें चाहिए रुतबा शान,
तुम्हें नहीं मुझसे मतलब,
मैं हूँ नुमाइश का सामान,
बस एक दिन नुमाइश का,
ज़िल्लत के बाक़ी सारे दिन,
अच्छा है जो मैं मर जाऊँ,
ऐसे जीवन से उबर जाऊँ !
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September 11, 2017

फ़रेब / delusion

फ़रेब / delusion
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आपको वक़्त मिल गया होगा,
कहीं कम-बख़्त मिल गया होगा,
दोस्त दुश्मन से नज़र आए होंगे,
दुश्मनों से आशना हुआ होगा ।
ग़मों में उम्मीदें नज़र आई होंगीं,
चमन सहरा में नज़र आया होगा,
वक़्त ने किया होगा फ़रेब कोई,
ख़िजाँ में बहर नज़र आया होगा !
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आज की कविता : गेय-अगेय संप्रेषणीय

आज की कविता 
गेय-अगेय संप्रेषणीय 

उसे शिकायत थी,
’आज’ की कविता से,
मानों ’आज’ कोई ठोस,
ज्ञेय, मन-बुद्धि-इन्द्रियग्राह्य,
हस्तान्तरणीय, विज्ञानसम्मत,
और सुपरिभाषित तथ्य हो,
कविता काल के पिंजरे में क़ैद,
कोई चिड़िया हो ।
हाँ कविता अवश्य ही,
एक चैतन्य और चिरंतन सत्ता है,
आकार-निराकार होने से स्वतंत्र,
और इसलिए कितने ही रूपों में,
अभिव्यक्त होती रहती हो,
उसकी सुचारु संरचना,
सुघड़ता, कितने ही आयामों में,
स्वर-क्रमों में निबद्ध होती हो,
निश्छल, छलशून्य होती है,
जिसे आप रच सकते हैं,आज की कविता
अपनी लय में,
छन्द-मात्रा-संगीत-स्वर-ताल,
की विशिष्ट मर्यादाओं में रहते हुए,
या उन अनभिज्ञ होते हुए भी ।
वह सदा गेय हो यह ज़रूरी नहीं,
जैसे भोर में चहचहानेवाली चिड़िया,
जिसके सुर कभी कर्कश, कभी मधुर,
कभी उदास, कभी आतुर,
कभी प्रसन्न, आर्द्र या शुष्क होते हैं,
चिर नूतन, चिर श्रव्य ।
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September 10, 2017

बहस करें या बस?

बहस करें या बस?
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धी अर्थात् ध् + ई, जो विशेष प्रयोजन के लिए बुद्धि का पर्याय है ।
धी जहाँ निधि, अवधि, विधि, शेवधि (तिजोरी) के रूप में स्थिरता की द्योतक है, वहीं बुद्धि अपेक्षतया गतिशीलता की, अस्थिरता की भी ।
इसी धी से उत्पन्न हुआ ग्रीक का ’थी’, ’थियो’ theo।
जैसे ’ध’ से धर्म, धर्म से ’थर्म’ therm,
’धी’ से ही ’थी’ theo , ’थियो’ और ’धर्म’ से ’थर्म’/ therm अर्थात् ’ताप’ हुआ ।
 ’धी’ से ही ’थीसिस’,’थीसिस’ से ’ऐन्टी-थीसिस’ और ’सिन्थेसिस’ हुए ।
धी > धिष् > धिषस् से भी थीसिस दृष्टव्य है ।
बहस की व्युत्पत्ति संस्कृत के ’व-ह-स’ से की जा सकती है, वहीं यह उर्दू में अरबी या फ़ारसी से आया ऐसा भी कहा जा सकता है ।
’ऐन्टी’ anti, एक ओर तो ’आन्तरिक’ के अर्थ में प्रयुक्त ’अन्तः’ से आया है, वहीं दूसरी ओर ’अन्त’ करनेवाले अर्थात् विरोधी या विपरीत के अर्थ में भी किया जाने लगा । इसी प्रकार ’ऐन्टी’ का ’अन्ते’ / ante के रूप में भी ’पूर्व’ के अर्थ में प्रयोग होता है ।
यहाँ वद् > वाद > विवाद और संवाद के संदर्भ में ’बहस’ के औचित्य के बारे में देखें ।
वाद का अर्थ है ’मत’ ’वादे-वादे जायते तत्वबोधः’ की उक्ति के अनुसार विभिन्न वाद मिलकर तत्व के निर्णय में सहायक होते हैं ।
किंतु एक विचित्र तथ्य यह भी है कि किसी भी वाद की अपनी सीमाएँ होती हैं इसलिए भिन्न-भिन्न वाद होने पर मतभेद भी हो जाते हैं । किसी प्रकार का पूर्वाग्रह न हो तो मतभेदों को पुनः मिलकर सद्भावना से सुलझाया जा सकता है, किंतु पूर्वाग्रह होने की स्थिति में यह असंभव हो जाता है । क्योंकि पूर्वाग्रह कोई मान्यता होता है । क्या बिना किसी मान्यता के कोई मत हो यह संभव है? जब हम ईश्वर या जीवन जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं तो इनके अभिप्राय के बारे में हममें उतनी ही स्पष्टता होती है जितनी हममें तब होती है जब हम धरती, आकाश, मनुष्य, भूख, प्यास, डर, नींद, और सोने-जागने आदि जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं । क्या तब इन वस्तुओं, घटनाओं या स्थितियों के बारे में हममें कोई मान्यता या मतभेद होते हैं? स्पष्ट है कि न हममें इनके बारे में कोई ’मान्यता’ होती है, (और इसलिए) न कोई पूर्वाग्रह होता है ।
किंतु जब किसी कार्य को किए जाने का प्रश्न होता है तब उसे कैसे किया जाए उसके औचित्य और अनौचित्य तथा उसके परिणाम आदि पर हममें प्रायः कोई न कोई आग्रह अवश्य होते हैं । इन आग्रहों के बारे में यदि परस्पर मिलकर विचार-विमर्श किया जाए तो संभवतः किसी एक निर्णय पर सहमत हुआ जा सकता है ।
इस प्रक्रिया को थीसिस-ऐन्टीथीसिस-सिन्थेसिस thesis-antithesis-synthesis कहा जा सकता है ।
यदि बहस इस प्रकार की गतिविधि है तो वाद-विवाद-संवाद का यह प्रकार थीसिस-ऐन्टीथीसिस-सिन्थेसिस thesis-antithesis-synthesis कहा जा सकता है । तब बहस की उपयोगिता पर प्रश्न नहीं उठाये जा सकते ।
बहस बस वहीं तक होनी चाहिए।
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भीड़ में अकेला आदमी

आज की कविता
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भीड़,
कितनी भी अनुशासित क्यों न हो,
अराजक और दिशाहीन होती है ।
भीड़ की संवेदनाएँ तो होती हैं,
भीड़ में समवेदनाएँ कम होती हैं,
भीड़ का कोई तंत्र नहीं होता,
भले ही भीड़ का नाम,
’देश’, ’राष्ट्र’ ’वाद’,’संस्कृति’,
’समाज’, ’समुदाय’ ’भाषा’,
'संस्था', 'सरकार', प्र-शासन,  
'दल', 'वर्ग' या ’धर्म’
'मज़हब' 'रिलीजन',
'रूढ़ि', 'ट्रेडिशन'  क्यों न हो।
अकेला आदमी भीड़ के लिए,
कुछ नहीं कर सकता ।
इससे भी बड़ा सच यह है;
कि भीड़ भी अपने लिए,
कुछ नहीं कर सकती ।
हाँ अपना सर्वनाश,
अवश्य कर सकती है,
लेकिन वह तो वैसे भी,
उसकी नियति है ।
इसलिए वह उससे,
बच भी नहीं सकती ।
और भीड़ है सिर्फ़,
अकेले आदमियों का समूह!
... तो हम क्या कह रहे थे?
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September 08, 2017

हाथी और चीटियाँ

आज की कविता
हाथी और चीटियाँ
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हाथी बहुत समझदार तो होते ही हैं,
उनकी याददाश्त भी तेज होती है ।
फ़ूँक-फ़ूँक डर-डर कर क़दम रखते हैं,
कहीं चीटियाँ, दबकर मर न जाएँ!
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इरमा !

आज की कविता
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इरमा !
नाम कितना सुन्दर लगता है न!
इरा और रमा का पर्याय,
इरा जो रमा है,
रमा, जो इरा है,
इरा ऐरावत सी,
इरावती सी,
ऐरावत,
जो इरा सा,
रमा जो चञ्चल,
अस्थिर,
केवल सुषुप्त हरि के चरण सहलाती,
किंतु वही इरा,
और वही रमा,
जब हो जाती है,
ऐरावत सी निरंकुश,
देती है पहले तो चेतावनी,
पर कर देती है सर्वनाश भी,
यदि उसकी संतान दुष्ट हो,
न करे उसका सम्मान,
हो उठे निरंकुश !
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