November 15, 2018

एक अधूरी कहानी

अधूरी खबरें 
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खबरों की भीड़ में भी हम शायद ही कभी कोई खबर पूरी तरह पढ़-सुन पाते हैं।  पूरी खबर वह भी नहीं होती जो हमारे अपने बारे में होती है, हालाँकि हम उसे याददाश्त के लिफ़ाफ़े में बंद कर मन की संदूक में रख देते हैं।  कभी-कभी उसे पूरी तरह पढ़े सुने बिना ही पुड़िया बनाकर हवा में उछाल देते हैं और भूल जाते हैं।  कभी-कभी बार-बार चुपके चुपके पढ़ते रहते हैं लेकिन तब भी वह पूरी नहीं हो पाती। बहुत से लिफ़ाफ़े और कभी कभी एक को खोलने की कोशिश में कोई दूसरा ही खुल जाता है।
कुछ खबरें चिट्ठियों की शक्ल में आती हैं तो कुछ कानोंकान सुनी जाती हैं।  दोनों स्थितियों में कुछ अधूरापन फिर भी होता ही है। कुछ खबरें हम किसी से शेयर करना चाहते हैं क्योंकि खुद से शेयर करने में डर लगता है।
वॉट्स-ऐप के समय में आप ऐसी ही कई अवाँछित खबरें रोज ही पढ़ते और डिलीट करते होंगे।
बहरहाल मेरी खुशकिस्मती रही कि मैंने कभी वॉट्स-ऐप जॉइन नहीं किया।
क्या होती है अधूरी खबर ?
कल ही एक ऐसी खबर पढ़ी।
एक बन्दर, एक माँ की गोद से उसके बच्चे को झपटकर ले गया।
विक्षिप्त कर देनेवाली ऐसी कितनी ही खबरें रोज़ घटती हैं, एक से एक हैरत भरी रोंगटे खड़े कर देनेवाली खबरें।  कोई भी, कहीं भी, कभी भी किसी अप्रत्याशित स्थिति का शिकार हो सकता है और कोई भी, कहीं भी, कभी भी किसी को अप्रत्याशित स्थिति में शिकार बना सकता है।
कभी तो ये घटनाएँ प्रत्यक्षतः और कभी अनचाहे ही प्रायोजित हुई होती हैं।
हर मनुष्य डरा हुआ और घबराया हुआ है फिर भी उत्तेजनाग्रस्त और उन्मादग्रस्त भी है।
निरंतर उत्तेजना की तलाश में, किसी सुख की तलाश में, किसी रोमांच की आशा में, जो उसके भविष्य को अधिक चमकदार बना दे, जोश और उमंग से भर दे, या किसी नशे में इस तरह डुबो दे कि कुछ समय तक संसार और समय का विस्मरण हो जाए।  यह नशा, एक किक हो सकता है या एक 'long-affair' भी हो सकता है।
जिसे वह 'प्यार' समझ सकता है। वह खेल, कला, संगीत, राजनीति या धर्म के क्षेत्र से जुड़ी कोई महत्वाकांक्षा भी हो सकता है। सबसे बड़ी बात कि वह निरंतर आगे (कहाँ?) बढ़ते रहने की अदम्य प्रेरणा भी देता है, जिसमें तमाम दुश्मनियाँ, घृणा, स्वार्थ एक मोहक आवरण में छिपे होते हैं।  जो दिखाई देता है वह वह नहीं होता, जो उस आवरण में छिपा हुआ होता है। 'सफलता' हमेशा क्षणिक ख़ुशी तो दे सकती है जो एक तरह का नशा भी हो सकता है। उतर जाने के बाद पुनः उसे पाना होता है।
कोई खबर कभी पूरी कहाँ होती है? किंतु नई खबरों के लिए हमारी उत्सुकता बनी ही रहती है।  इतनी खबरे हमें रोज़ मिलती रही हैं, -क्या उनसे हमारे मन को कभी ऐसी शान्ति मिलती है कि हम आराम से थोड़ी देर सो सकें? होता तो यही है कि बुरी तरह थक जाने पर भी किसी नई खबर की उम्मीद में हम नींद को आने ही नहीं देते।  यह आदत बन जाती है।
यह भी एक अधूरी कहानी है।
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November 12, 2018

आर्यान्

अयोध्या, अमित शाह और ओवैसी
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ओवैसी ने श्री अमित शाह को कहा कि उनका नाम ईरानी है और यदि इलाहाबाद तथा फैज़ाबाद का नाम बदला जाना चाहिए तो उन्हें खुद का नाम भी बदल लेना चाहिए।
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वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड, सर्ग 54 में वर्णन है :
इत्युक्तस्तु तया राम वसिष्ठस्तु महायशाः। 
सृजस्वेति तदोवाच बलं परबलार्दनम्।। 17
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सुरभिः सासृजत् तदा ।
तस्या हुंभारवोत्सृष्टाः  पह्लवाः शतशो नृप ।। 18 
नाशयन्ति बलं सर्वं विश्वामित्रस्य पश्यतः।
स राजा परमक्रुद्धः क्रोधविस्फारितेक्षणः  ।। 19
पह्लवान् नाशयामास शस्त्रैरुच्चावचैरपि।
विश्वामित्रार्दितान् दृष्ट्वा पह्लवाञ्शतश स्तदा  ।। 20
भूय एवा सृजद् घोराञ्छकान् यवनमिश्रितान्।
तैरासीत् संवृता भूमिः शकैर्यवन मिश्रितैः ।। 21    
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श्रीराम से यह कथा मुनि शतानन्द ने कही।
स्पष्ट है कि  इसमें पहलवी राजाओं के साथ साथ शक तथा यवन नरेशों की उत्पत्ति कैसे हुई यह बतलाया गया है।  महायशाः / यशाः से शाह का उद्भव दृष्टव्य है।  ईरान शब्द भी आर्यान् का अपभ्रश है। 
इसलिए अमित शाह को अपना नाम बदलने की ज़रूरत कदापि नहीं है। 
और न ही स्मृति ईरानी को।
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परशुराम ने 'परशु' को लेकर गोकर्ण (गोवा) की स्थापना की।  अरब सागर (फ़ारस की खाड़ी) से भूमि निकालकर परशु-देश (फारस) में अपना राज्य स्थापित किया।
इस परशु से अथवा पार्श्व या पार्षद (पारसी में फ़रिश्तः) के सज्ञाति / cognate अंग्रेज़ी / इटैलियन में  'फ़ार्स' / 'Farse' / 'Fascist' हुए।
मुसोलिनी की पार्टी का चिन्ह यही 'परशु' था जो कुल्हाड़ी जैसा लकड़ी या घास काटने का औज़ार था जिसे घास या लकड़ी के गट्ठर पर प्रदर्शित किया गया है।
इसी प्रकार जर्मन नाज़ी की पहचान संस्कृत 'नृ' से कैसे नृप, Natsion (nation)  से लेकर तमिल 'नाडु' (देश) से सम्बद्ध है इस पर विस्तार से अपनी बहुत सी पोस्ट में लिख चुका हूँ।
प्रसंगवश यहाँ लिखना उपयुक्त जान पड़ा।
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November 07, 2018

कविता / इस दीवाली

छोटी कविता / इस दीवाली
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तुम हमें यूँ ही याद करते रहना,
कहीं न भूल न जाएँ हम तुमको !
ग़म हमें यूँ ही याद करता रहे,
कहीं न भूल न जाएँ हम ग़म को !
मुबारकवाद है, रस्मे-दुनिया,
याद करता है कौन, वर्ना हमको,
कहीं हम भूल न जाएँ तुमको,
याद तुम कर लिया करना हमको !
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November 06, 2018

आज की कविता / खुशबू

मैं हवा की तरह आया था,
मैं हवा सा लौट जाऊंगा,
तेरी साँसों से तेरे दिल में,
मैं चुपके से उतर जाऊंगा।
नज़र आऊंगा मैं हर तरफ,
लेकिन न देख पाओगे,
हर तरफ क्योंकि मैं तब,
खुशबू सा बिखर जाऊंगा। 
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November 05, 2018

पूर्वावलोकन / In Retrospect ...

आरंभ से अब तक / इतिहास
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दिनांक २०/०१/२००९ को प्रथम ब्लॉग में पहला पोस्ट 'आरंभ' लिखा था।
लगभग १० वर्ष पूरे हो रहे हैं।
इस बीच नेट पर ट्विटर और फेसबुक पर भी बहुत सक्रिय रहा।
वह भी कुछ मित्रों / परिचितों के आग्रह पर। 
लेकिन अब कुछ समय पूर्व से इन दोनों से विदा ले चुका हूँ।  
ब्लॉग लिखने का एकमात्र ध्येय यह था कि अपनी खुशी के लिए कुछ लिखूँ।
इसका उद्देश्य किसी से जुड़ना या अपने को किसी प्रकार से स्थापित करना तो कदापि नहीं था। 
और बिज़नेस या पैसा / यश कमाना तो कल्पना तक में नहीं था, -न है। 
सिद्धांततः और दूसरे कारणों से भी न तो मेरी आजीविका का कोई स्थिर और सुनिश्चित साधन है, न मैं इस बारे में कभी सोचता हूँ।  इसलिए भी कभी-कभी यह सोचकर आश्चर्य होता है कि यह ब्लॉग-उपक्रम कैसे अब तक चल सका।
इसके लिए अवश्य ही Google का आभार !
इस बहाने मुझे लिखने, और प्रस्तुत करने के लिए बहुत से विषयों का अध्ययन करने का अवसर मिला।
यहाँ तक तो ठीक है पर इस दौरान लगता रहा यह जो 'है', क्या वस्तुतः है ?
क्या यह हमेशा रहेगा? रह सकता है?
इसलिए यह बोध भी हमेशा बना रहता है कि यह जो 'है' जैसा लगता है, यह वस्तुतः 'है नहीं' , बस लगता भर 'है', कि यह 'है'  .....
इस बीच swaadhyaaya नामक नया ब्लॉग शुरू किया जिसके व्यूअर्स तीन साल में ही इस 'हिंदी-का-ब्लॉग' के ९ वर्षों में कुल हुए व्यूअर्स से दुगुने हो गए !
ख़ास बात यह कि व्यूअर्स कितने हैं इससे मेरा लिखना अप्रभावित रहा।
 रूचि हो तो मेरे अन्य ब्लॉग देखने के लिए मेरी 'प्रोफाइल' देख सकते हैं।  
सादर !
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October 24, 2018

भगवाकरण / Saffronization / काश्मीरीकरण

प्रसंगवश
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"Saffronization / भगवाकरण" इस शब्द का प्रयोग हिन्दूवादी-संगठनों के विरोधी अपने राजनीतिक उद्देश्यों की सिद्धि के लिए इस प्रकार करते हैं जिससे लगता है जैसे कि "Saffronization / भगवाकरण" के पक्षधर हिन्दुत्ववादी दृष्टिकोण देश पर और जनता पर बलपूर्वक लादना चाहते हों।
काश्मीर की वर्त्तमान स्थिति जो नेहरूजी के समय से बिगड़ते-बिगड़ते यहाँ तक आ चुकी है कि अलगाववादी ताकतों ने काश्मीरियत के मुद्दे को भुलाकर भारत को तोड़ने के लक्ष्य को मूल मुद्दा बना दिया है।
किंतु काश्मीर और भारत कैसे एक दूसरे से अभिन्न हैं इसे समझने के लिए यदि हम आदिशंकराचार्य रचित "आनन्दलहरी" के प्रथम तीन श्लोकों को स्मरण करें तो  "Saffronization / भगवाकरण" का वास्तविक अर्थ समझना आसान हो जाता है और तब भारत का "Saffronization / भगवाकरण" किया जाना संभवतः हमारे लिए गर्व का विषय होगा।
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  आनन्दलहरी (श्रीशङ्कराचार्यकृता)
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भवानि स्तोतुं त्वां प्रभवति चतुर्भिर्न वदनैः
प्रजानामीशानस्त्रिपुरमथनः पञ्चभिरपि ।
न षड्भिः सेनानीर्दशशतमुखैरप्यहिपति-
स्तदान्येषां केषां कथय कथमस्मिन्नवसरः ॥१
घृतक्षीरद्राक्षामधुमधुरिमा कैरपिपदै-
विशिष्यानाख्येयो भवति रसनामात्रविषयः ।
तथा ते सौन्दर्यं परमशिवदृङ्मात्रविषयः
कथङ्कारं ब्रूमः सकलनिगमागोचरगुणे ॥२
मुक्घे ते ताम्बूलं नयनयुगले कज्जलकला
ललाटे काश्मीरं विलसति गले मौक्तिकलता ।
स्फुरत्काञ्चीशाटी पृथुकटितटे हाटकमयी
भजामि त्वां गौरीं नगपतिकिशोरीमविरतम् ॥३
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प्रस्तुत स्तवन माता पार्वती की स्तुति में रचा गया है। विचारणीय है कि श्रीशंकराचार्य जिनका जन्म कालडी नामक स्थान पर, दक्षिण भारत के वर्त्तमान केरल राज्य में हुआ था।  तथापि भारत की राष्ट्रीय अस्मिता का ऐतिहासिक प्रमाण इससे बढ़कर क्या हो सकता है कि उन्होंने भारत राष्ट्र को एक सूत्र में  बांधते हुए सनातन धर्म के न सिर्फ चार मठों की स्थापना की, बल्कि अनेक संस्कृत रचनाओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति और दर्शन को पुनरुज्जीवित किया और सशक्त तथा दृढ आधार प्रदान किया।
नगपतिकिशोरी पार्वती का नाम है जो हिमालय की पुत्री हैं।
"ललाटे काश्मीरं" में उन्होंने न केवल माता पार्वती के ललाट पर राजित केसर / केशर को प्रतीकार्थक रूप में भारत माता के मस्तक के रूप में चित्रित किया, बल्कि काश्मीर का भारत के लिए क्या महत्त्व है यह भी दर्शाया।
काश्मीर की संस्कृति और इतिहास को भारत के सन्दर्भ में देखें तो लल्लेश्वरी या लल्ल-दय्द (1320-1392)  को कैसे भुलाया जा सकता है जो ललिता अर्थात् पार्वती के संस्कृत नाम का काश्मीरीकरण / Saffronization है।
इस प्रकार माता पार्वती का ही एक रूप इस भक्त-कवियित्री के रूप में धरा पर अवतरित हुआ ऐसा सोचना अनुचित न होगा।  'दय्द' संस्कृत 'दुहिता' अर्थात् 'पुत्री' का ही पर्याय है और जहाँ पार्वती / ललिता हिमालयपुत्री है, वहीं लल्ला भी हिमालयपुत्री ही है इसमें संदेह नहीं।
क्या तब भारत का "Saffronization / काश्मीरीकरण"  किया जाना प्रशंसनीय नहीं होगा?
लेकिन राजनीतिज्ञ सत्ता के लिए वोट, वोटों के लिए तुष्टिकरण, और तुष्टिकरण के लिए  "Saffronization / काश्मीरीकरण" को "भगवाकरण" कहकर हिंदुत्व का मज़ाक तो उड़ाते ही हैं, भारत और हिंदुत्व के प्रति अपने विद्वेष का प्रदर्शन भी करते हैं।
समय आ गया है कि "Saffronization / काश्मीरीकरण" को एक  तमग़े / ताम्रक की तरह गर्व से अपने सीने पर टांका जाये।  यह स्वाभिमान की बात है न कि उपहास, अपमान या निंदा की। 
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October 23, 2018

आपकी जय हो !!

आशीर्वाद !
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करीब चार महीने पहले संस्कृत वाल्मीकि-रामायण को  पूरा पढ़ा।
इससे पहले स्वामी विद्यारण्य रचित पञ्चदशी को हाथ से लिखा (कॉपी किया)
मूल संस्कृत ग्रंथों के साथ दिक्कत यह है कि पढ़ते समय यह समझना कठिन होता है कि वास्तव में जो असमंजस है, वह प्रिंटिंग-इरर है, या मूलतः इरर है ही नहीं और मेरे संस्कृत के ज्ञान की खामी से मुझे इरर लग रही है।
मैं जब किसी संस्कृत (या मराठी / अंग्रेज़ी ) ग्रन्थ को पढ़ता हूँ तो मेरे पास उपलब्ध सारे शब्द-कोष, व्याकरण आदि को सामने रखता हूँ। संस्कृत / मराठी / अंग्रेज़ी व्याकरण का कामचलाऊ ज्ञान तो मेरे पास है किंतु अपने उस ज्ञान के प्रामाणिक होने का मुझे भरोसा नहीं।
कंप्यूटर पर सीधे लिखने / typeset करने में और अधिक भूल होने की संभावना होने से 'लिखना' ही सर्वाधिक सही लगता है।
ऐसे ही उपरोक्त दो ग्रंथों के अनुशीलन के समय 'आशी' शब्द को समझने का मौक़ा मिला।
संस्कृत में यह शब्द 'आ' उपसर्ग के साथ  'शी' -- 'शेते' अर्थात् 'सोता है' के अर्थ से युक्त होने पर आशय अर्थात् भाव / भावना का पर्याय होता है। इस प्रकार 'आशी' का तात्पर्य 'स्वस्ति' / मंगल / कल्याणप्रद होता है।
यह देखना रोचक है कि संस्कृत व्याकरण में आशीर्लिङ् दस लकारों में से एक 'लकार' / tense है।  इसी से मिलता जुलता है 'विधिलिङ्' जो विधि / सही तरीके या रीति के संकेत के लिए प्रयुक्त होता है।
व्याकरण के अपने अध्ययन में मैंने अनुभव किया कि जहाँ प्रायः किसी भाषा का व्याकरण उसके प्रचलित रूप के अनुसार विविध नियमों को संकलित कर निर्मित किया जाता है, संस्कृत में इससे बहुत भिन्न रीति से शब्द अर्थात् ध्वनिशास्त्र (Phonetics) के आधार पर ध्वनि-संकेतों के वर्ण-समुच्चय से एक या एक से अधिक ध्वनियों के संयोग से बने शब्द (word) से कोई 'अर्थ' ज्ञात / सिद्ध किया जाता है, जो भिन्न-भिन्न सन्दर्भों और प्रसंगों के साथ भिन्न-भिन्न तात्पर्य देता है।
इस प्रकार संस्कृत भाषा को शुद्ध कर बनाई गयी भाषा है यह सोचना पूरी तरह सही नहीं है।
इसलिए यह प्रश्न ही व्यर्थ हो जाता है कि कोई भाषा संस्कृत से व्युत्पन्न (derived) है या संस्कृत किसी अन्य भाषा से व्युत्पन्न (derived) है।
'आशी' का एक अन्य अर्थ, 'अश्' धातु से बननेवाले शब्द आशी के रूप में सर्पदन्त के लिए प्रयोग होता है:
आशी  -- आश्यां  विषं यस्य; सर्प का दाँत।
आशी तालुगता दंष्टा तथा विद्धो न जीवति :
साँप के दाँत से जिसे डसा गया हो, वह जीवित नहीं रहता। 
'आशीर्वाद' के बारे में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि आशीर्वाद देने / लेने का अधिकार तथा पात्रता होने पर ही उसका कोई मतलब होता है, वरना वह सिर्फ औपचारिकता होता है। 
इसलिए आशीर्वाद कभी-कभी 'शाप' भी हो जाता है।
शाप शब्द भी उसी 'शप्' धातु से बना है जिसमें 'प्' प्रत्यय 'श' के बाद लगने पर तिरोधान-सूचक 'इत्'-संज्ञक है :
तस्येतो लोपसंज्ञकः (हलन्त्यम् -- अष्टाध्यायी --१ / ३ / ३,
उपरोक्त उदाहरण यह समझने के लिए भी सहायक है कि क्यों संस्कृत का व्याकरण, अन्य भाषाओं की तरह  प्रचलित नियमों (conventions) के संकलन के आधार से नहीं, बल्कि मूलतः किसी अन्य रीति से 'उद्घाटित' / सिद्ध किया गया है।
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और यह भी मज़ेदार बात है कि हम प्रायः भगवान से आशीर्वाद माँगते तो हैं उन्हें आशीर्वाद देते भी रहते हैं !
आपकी जय हो !
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October 13, 2018

कब होगी?

इस रात की सुबह ....
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पूरब में 'तितली' पंख फड़फड़ाती है,
सागर से बीस-बीस फुट ऊँची लहरें,
कर देती हैं, 'नई' सभ्यता को तबाह,
ध्वंस का उल्लास नहीं बख्शता है,
किसी ऊँची इमारत को, टॉवर को,
'तितली' जानती है, कब बदला लेना,
बड़े-बड़े होर्डिंग्स, झूलते गिरते हैं,
और हवा का ताण्डव, उलट देता है,
सजावटी चेहरों पर चढ़ी नक़ाब ,
मी टू, यू टू, दे टू, ही टू, वी ऑल,
दौड़ते हैं ढूँढते हैं, छिपने की जगह,
तितली नहीं पता कितनी नाज़ुक है,
उसके पंखों के वार कितने कातिल हैं,
उड़ते उड़ते ही बिखेर देगी टुकड़े टुकड़े,
उड़ा देगी धज्जियाँ, लिपे पुते चेहरों की,
कुछ इस तरह कि न पहचान सकेंगे,
और न दिखा सकेंगे, किसी को भी,   
मी टू, यू टू, दे टू, ही टू, वी ऑल,
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'ध्वंस का उल्लास' 

October 08, 2018

शुक्रिया सभी का !

किसी समय मई 2016 में, एक ही दिन करीब 576 पाठकों ने मेरा यह ब्लॉग देखा था।
दो दिन पहले दिनांक 06-10-2018  को करीब 300 पाठकों ने मेरा यह ब्लॉग देखा था।
यह मेरा एक दिन का अधिकतम 'व्यूकाउन्ट' है।
प्रायः तो यह आँकड़ा दहाई की हद में होता है।
वैसे मैं अपनी पोस्ट्स बहुत कम 'शेयर' करता हूँ और वह भी केवल G + पर ही और इसलिए आश्चर्य होता है कि कौन अचानक कभी-कभी मेरे ब्लॉग पर नज़रें इनायत करते हैं।
बहरहाल शुक्रिया सभी का !
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October 06, 2018

ज़िन्दगी मर्ज़ है इक लाइलाज,

निजात / कविता 
ज़िन्दगी मर्ज़ है इक लाइलाज,
नहीं है मौत भी दवा / निजात,
अगर यक़ीं है मज़हब-किताब पर,
हुआ फ़ज़ल तो नसीब होगी क़ब्र,
और फिर बस इंतज़ार करते रहना
ताक़यामत करवटें बदलते हुए,
फिर भी अंदेशा तो ये रहेगा ही,
फ़ैसला क्या होगा आख़री रोज़,
कैसा मुश्क़िल है सफ़र ज़िन्दगी,
मौत के बाद भी निजात नहीं,
इससे बेहतर तो शायद यह होगा,
जैसे हो इस दश्त से निकल आओ,
पता लगा लो कि कौन जीता है,
पता लगा लो कि मरता है कौन,
जब तलक वहम है अपने होने का,
तब तलक ज़िन्दगी रहेगी मर्ज़,
ये वहम भी टूट जाएगा जिस दिन,
मौत से पहले ही होगी निजात ।
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