November 21, 2017

कविता का गूढ किंतु प्रकट सौन्दर्य

कविता लिखना और पढ़ना दोनों चित्त को उत्फुल्ल कर देते हैं ।
कोई कविता किसी दूसरी से कम या अधिक भावपूर्ण हो सकती है,
भाव और अभिव्यक्ति की शैली और शब्द भी कम या अधिक सुंदर हो सकते हैं फिर भी उनमें से कौन सी श्रेष्ठ है कहना कठिन हो सकता है क्योंकि कविता मूलतः छन्द है, वेद को ’छन्द’ कहा जाता है, ईश्वर को ’कवि’ और कवि वह होता है जो अपना ’छन्द’ खोज लेता है ।
इसलिए हर कवि अपने-आपको खोजते खोजते अपना छन्द खोज लेता है, और तब उसकी कविता अवश्य ही उसके भाव / भावना का साकार रूप होती है । सवाल सिर्फ़ यह है कि वह किस बारे में कुछ कहना / लिखना चाहता है ! और जब वह ऐसा जान लेता है तो उसे इसके लिए भीतर से ही प्रेरणा भी अनायास मिल जाती है ।
--
दूसरी ओर किसी दूसरे की लिखी कविता पाठक को इस हद तक भाव-विभोर कर सकती है जिसे लिखते समय कवि स्वयं भाव की उस गहराई को न छू पाया हो, अर्थात् पाठक उस गहन भाव-दशा में निमग्न हो सकता है जो वस्तुतः उसकी अपनी चित्त-दशा और मन की गहराई होती है और कवि केवल उस गहराई तक जाने के लिए उत्प्रेरक भर होता है । इसलिए कभी-कभी कविता लिखते समय कवि के मन में जिसकी कल्पना तक नहीं हुई होती, पाठक रचना में उस अर्थ का आविष्कार कर लेता है और कवि / कविता से अभिभूत हो उठता है ।
यह चमत्कार कविता का गूढ किंतु प्रकट सौन्दर्य भी है ।
--

कविता : तुम्हारे लिए,

आज की कविता

तुम्हारे लिए,
--
मैं तुम्हारी कविता को सुनता भर हूँ,
सुनकर मेरा चेहरा,
ज़रूर कोई प्रतिक्रिया देता होगा,
लेकिन वह उसकी प्रतिक्रिया होती है,
-मेरी नहीं ।
मैं तुम्हारी कविता को सुनता भर हूँ,
तुम्हारी कविता उतर आती है ज़ेहन में,
हो जाती है मेरे वज़ूद का हिस्सा,
जिसे बाक़ी हिस्सों से अलग नहीं देखा जा सकता ।
मैं तुम्हारी कविता को सुनता भर हूँ,
जैसे सुनता हूँ,
बारिश की बूँदों की टप्-टप्,
जो बदलती रहती है लय-ताल,
कभी तेज़ कभी धीमे स्वरों में,
साँस सी चलती रहती है मेरे भीतर,
और मैं साँस को कभी महसूस न भी करूँ,
तो भी ज़िन्दा रहता हूँ उन्हीं से !
मैं तुम्हारी कविता को सुनता भर हूँ ।
--
21-11-2017

November 16, 2017

सृजन अश्रु है!

सृजन अश्रु है!
--
अश्रु भी सृजन है,
इसलिए आह्लाद है,
अश्रु भी विरह है,
इसलिए पीड़ा है,
अश्रु भी मिलन है,
इसलिए सुख है,
अश्रु भी प्रकृति है,
इसलिए मुक्ति है,
अश्रु जब बहता है,
स्रष्टा है, सरिता है,
अश्रु जब रुकता है,
कथा है, कविता है !
--

November 12, 2017

कविता से!

>
कविता से!
--
मैं प्रेयसि बन जाऊँ कविते,
तुम बन जाना प्रियतम,
तुम कविता रचना मुझ पर,
मैं इठलाऊँगा शर्माऊँगा!
रूठूँगा भी मैं कभी-कभी,
चाहे झूठा या सच्चा हो,
तब तुम मुझे मनाना प्रियतम,
सपना मीठा या कच्चा हो!
प्रकृति तुम्हारा देह-रूप,
मैं निराकार बस शून्य-व्योम,
नर्तकि तुम हो सतत नृत्य,
मैं हूँ अचल, निरंतर मौन!
तुम दिग्-दिगन्त तक फैले सुर,
लय तान ताल तुम छन्द-शब्द,
मैं श्रोता दर्शक बस विमुग्ध,
मेरा अस्तित्व केवल निःशब्द,
जब मैं तुम हो जाऊँगा,
जब तुम मैं हो जाओगी,
सृष्टि पूर्णता तब होगी,
तब तक तो है यह अपूर्ण ।
प्रणयोत्सव का मर्म यही ,
कवि कविता हों परम अनन्य,
कविता में कवि, कवि में कविता,
विलय परस्पर जीवन धन्य ।
--


November 07, 2017

छोटी कविता : पत्थर

>
नज़्म पत्थर हुआ करे कोई,
बज़्म पत्थर हुआ करे कोई,
अजीब दस्तूर है जमाने का
रस्म पत्थर हुआ करे कोई !
--

इंडियन रोप-ट्रिक

इंडियन रोप-ट्रिक / कविता
--
हैरत कि हवा में खड़ा रस्सा,
गिरता भी नहीं, हिलता भी नहीं,
मेले में आया, तो यहाँ खिंचा आया,
कौन है जादूगर पता नहीं मुझको,
देखता हूँ कई लोग हैं कतारबद्ध,
मैं भी हूँ उनमें से एक तमाशबीन,
और अब एक शख़्स आया आगे,
चढ़ने लगा है वो रस्से पे अब,
धीरे-धीरे वो पहुँच गया है वहाँ,
जहाँ दिखाई देता है रस्से का सिरा,
और फिर होता है अचानक ग़ायब,
हवा में घुल गया हो जैसे वो,
और अब आ गई मेरी भी बारी,
न कोई शक या डर न घबराहट,
सधे क़दमों से मैं जाता हूँ वहाँ,
दोनों हाथों में पकड़कर रस्सा,
पैरों से उसका सहारा लेकर,
और सब साँस रोककर के मुझे,
देखते हैं लोग बड़ी हैरत से मुझे ,
उन सबको भी आना है मेरे पीछे,
राज़ फिलहाल बस मुझे है मालूम,
और मैं लो पहुँच गया हूँ वहाँ,
जहाँ दिखाई देता है रस्से का सिरा,
ज़िन्दगी पड़ाव नहीं, चढ़ाव है एक,
चढ़ते जाना ही सबकी मंज़िल है,
और मंज़िल पे पहुँच जाने के बाद,
ऐसे हो जाना अचानक ग़ायब,
हवा में घुल गया हो जैसे कोई ।
और फिर पहुँच गया हूँ वहाँ,
मिल रहे हैं मेले के जहाँ टिकिट,
लग गया हूँ फिर से मैं कतार में,
अभी पूरी नहीं हुई हसरत ।
-- 
   

November 04, 2017

चिरंतन प्रेमी

आज की कविता
--
द्वार पर संध्या की आहट,
आ रही पदचाप उसकी,
जा रहा मध्याह्न भी अब,
दो घड़ी का मिलन उनका,
रोज़ ही मिलते-बिछुड़ते,
जैसे पुरातन दोनों प्रेमी,
द्वार ठिठका देखता भर,
प्रीति का यह मिलन अद्भुत् ।
--
नमस्ते!

संक्रमण / Transmigration.

हिन्दी अनुवाद : विनय कुमार वैद्य
महासमाधि 
गहन ध्यानमग्नता में मैं इस देह को त्याग देता हूँ,
शाश्वत दिवस के उजाले की निःस्तब्धता में लीन,
मेरी आत्मा परमेश्वर की महिमा में जीवंत-प्राणवान,
सभी लोकों के सौहार्द्र में सुन सकते हो इसे तुम,
मैं पुनः देह में अवतरित हो आऊँगा अपने संकल्प से,
किंतु अंततः तो रेत में खड़े महल सा ढह जाऊँगा,
और किसी दिन यह समूची धरती भी नहीं होगी,
इन विशाल महासागरों और उनके तटों के साथ,
महाशून्यता भौतिक-सृष्टि को अभिभूत कर प्रकट होगी,
और बहुत सी जीवात्माएँ संक्रमण करेंगीं परमेश्वर में!
--

November 02, 2017

कच्चा मन, पक्का मन ...

कुछ भी !
--
ख़याल कच्चा है, कच्चा ही उसे रहने दो,
दिल जो बच्चा है, बच्चा ही उसे रहने दो,
ख़याल दिल में अंधड़ से चले आते हैं,
दिल में धूल बस छोड़कर चले जाते हैं,
धूल बस बना देती है दिल को बोझिल,
क्यों उसमें ख़यालों की झलक पाते हैं?
ख़याल ताज़ा है, आहट है नए मेहमाँ की,
ख़याल नाज़ुक है छुअन है उसमें तितली की,
ख़याल हर रंग में हर रूप लिए रहता है,
बस वो दिल को छूकर के गुज़र जाता है,
दिल जो बस फूल है, फूल ही उसे रहने दो,
दिल के इस फूल पर धूल मत चढ़ने दो,
और जब चढ़ने लगे दिल को सूख जाने दो,
दिल को हर दिन नए फूल सा खिल जाने दो,
मन ये जो पौधा है जिस पे फूल लदे रहते हैं,
हाँ ये करता है इंतज़ार सदा तितली का,
हाँ ये करता है इंतज़ार फूलों भौरों का ।
ये देवता नहीं जिस पे चढ़ाओ तुम फूल,
हाँ ज़रूरी है न चढ़ने दो इस पर धूल,
मन ये हर रोज़ हुआ करता, जागता है नया,
और हर रंग में बढ़ता ही रहता है हर रोज़,
ये जवान ही हुआ करता है, दिन पर दिन,
ये कभी बूढ़ा नहीं होता न मरता है कभी,
राज़ इसका कभी अगर तुम ये समझ जाओगे,
इसमें जीवन की हक़ीकत भी समझ जाओगे ।
--   
कच्चा मन, पक्का मन ...


October 23, 2017

दावे!

कविता 
दावे!
--
कलम का दावा था,
’मैं लिखती हूँ’
कागज़ का दावा था,
’मेरे होने से’,
उँगलियाँ कहती थीं,
’हम लिखती हैं’,
हाथ कहता है,
’मैं लिखता हूँ’
दिल को मालूम नहीं,
लिखता है कौन,
और वो लिखता है,
बेबस,
बस होता है मौन!
--