June 17, 2010

--हरित-ऋतु--



--------हरित-ऋतु--------
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आखिर कितने दिनों तक यूँ ही,
बैठे रहें पुरानी बातें लेकर ?
हमे ही शुरू करना होगा,
अपना नया जीवन,
-नये सिरे से !
पुरानी मटमैली दीवारों को,
-देने होंगे नए रंग
लयतालहीन पुराने शिथिल गीत में,
''स्वर नहीं रहे !''
-कब तक करते रहें ऐसी शिकायत?
 हमें ही देने होंगे उसे,
-स्वर नए रसीले !
तितली के नाज़ुक परों मे,
खोजने होंगे नए रंग,
-हमे
और उतारनी होगी मोगरे की भीनी महक,
-अपने जीवन में,
-हमें ही !
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*A comment I made, on a post of Ravindra Koshthi,
 on face-book, On 17-06-2010.
 Titled  : rutu hirwa,
(it is information about a marathi poem,composed
 by his daughter Jivanika koshti, and I translated the 
same into Hindi.  Credits go to Jivanika, for her this
 nice poem).

5 comments:

  1. विनयजी! आपका बहुत बहुत धन्यवाद. और हा आपने मराठी से हिंदी में बहुत ही सुन्दर अनुवाद किया है. बधाई हो.

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  2. वाह !कितनी मनभावन कविता

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  3. रचनाजी,
    हरित-ऋतु शीर्षक से प्रकाशित जीवनिका कोष्टी की मूल
    मराठी कविता के मेरे द्वारा किए गए हिन्दी रूपान्तर को
    पढ़ने और टिप्पणी लिखने के लिए धन्यवाद ।
    सादर,
    -विनय

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  4. वाह पारूल !
    आपकी एक टिप्पणी से इस कविता के सौन्दर्य
    और अर्थपूर्णता में निखार आ गया ।
    आभार और धन्यवाद !!

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