February 16, 2013

।। आत्मानंद ।। (कविता)





























।। आत्मानंद ।।
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2 comments:

  1. वाह विनय जी कितनी सुंदरता से आपने एक सच को कविता का रूप दिया है

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  2. सुनीता जी,
    वास्तव में मैंने अपने गुरुजनों से जो सीखा उसका सार यही है कि मन यद्यपि नित्य आत्मा में ही स्थित है, और गहरी सुषुप्ति को कोई भी त्यागना नहीं चाहता, हालाँकि उस स्थिति में जगत् की कोई वस्तु ’हमारी’ नहीं होती, किन्तु तब भी हम स्वाभाविक और पूर्ण आनन्द का उपभोग करते हैं । निद्रा से जागने पर भी कुछ क्षणों तक मन उस नीरवतापूर्ण शान्ति में मग्न रहता है, फ़िर संसार और संसार में अपने ’कुछ’ विशिष्ट होने का खयाल चित्त में कौंधता है । इसके बाद ही तमाम चीजें हम पर हावी हो जाती हैं, हम जगत की भूलभुलैया में भटक जाते हैं । अगर हम गहरी सुषुप्ति में जो थे, उसे ही जागृति में भी पहचान सकें, तो उपनिषदों में वर्णित सत्य समझने में हमें देर नहीं लगती । आपकी इतनी सुन्दर सारगर्भित टिप्पणी से जो अथाह सन्तुष्टि हुई, उसके लिए बहुत आभारी हूँ ।
    सादर,

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