January 06, 2018

ईश्वर की आत्म-कथा / कविता

ईश्वर की आत्म-कथा
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थका-थका सा उनींदा सा ये आदमी,
उचटी नींद से अभी ही जागा हो जैसे,
ये बोझिल-बोझिल सी आँखें उसकी,
स्वप्न तो नहीं, नींद का ख़ुमार है बाक़ी,
देखकर पल भर को आसपास अपने,
फिर से सो जाएगा, लौट जाएगा वहीं,
जहाँ से कोई ख़बर या चिट्ठी नहीं आती,   
थका-थका सा उनींदा सा ये आदमी,
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आहटें चैन से उसे सोने क्यों नहीं देती,
उसे क्या मिलना है यहाँ क्या खोना है,
क्या उसे चाहिए, क्यों उसे जगाते हो,
उसे जागना भी नहीं और ना जगाना है,
फ़लसफ़ा उसका है चैन से सोए हर कोई,
थका-थका सा उनींदा सा ये आदमी,
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तुम्हें जागने की हसरत या ज़रूरत हो,
जागना तुम्हारा फ़र्ज़ हो या मज़बूरी हो,
तो कहाँ रोकता टोकता है वह तुम्हें,
मत उसे छेड़ो नाहक चैन से सोने दो,     
थका-थका सा उनींदा सा ये आदमी,
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