September 10, 2017

भीड़ में अकेला आदमी

आज की कविता
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भीड़,
कितनी भी अनुशासित क्यों न हो,
अराजक और दिशाहीन होती है ।
भीड़ की संवेदनाएँ तो होती हैं,
भीड़ में समवेदनाएँ कम होती हैं,
भीड़ का कोई तंत्र नहीं होता,
भले ही भीड़ का नाम,
’देश’, ’राष्ट्र’ ’वाद’,’संस्कृति’,
’समाज’, ’समुदाय’ ’भाषा’,
'संस्था', 'सरकार', प्र-शासन,  
'दल', 'वर्ग' या ’धर्म’
'मज़हब' 'रिलीजन',
'रूढ़ि', 'ट्रेडिशन'  क्यों न हो।
अकेला आदमी भीड़ के लिए,
कुछ नहीं कर सकता ।
इससे भी बड़ा सच यह है;
कि भीड़ भी अपने लिए,
कुछ नहीं कर सकती ।
हाँ अपना सर्वनाश,
अवश्य कर सकती है,
लेकिन वह तो वैसे भी,
उसकी नियति है ।
इसलिए वह उससे,
बच भी नहीं सकती ।
और भीड़ है सिर्फ़,
अकेले आदमियों का समूह!
... तो हम क्या कह रहे थे?
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