September 30, 2017

आज की कविता / कलम

आज की कविता
कलम
खेतों में हल की तरह कभी,
युद्ध में पहल की तरह कभी,
कभी ये कलम रुकती नहीं,
कभी ये कलम चलती नहीं,
बियाबान पथ पर निर्जन में,
कभी राजपथ संकुल-जन में,
कभी ये कलम रुकती नहीं,
कभी ये कलम चलती नहीं,
खड़ी चट्टान पर हाँफ़ती भी,
गहरी खाईं में उतरती भी,
कभी ये कलम रुकती नहीं,
कभी ये कलम चलती नहीं,
जमीं पर कभी घोर जंगल में,
कठिन धूप में भी मरुस्थल में
बीहड़ों में या दलदल में,
कभी ये कलम रुकती नहीं,
कभी ये कलम चलती नहीं,
तलवार सी या पतवार सी,
कभी शत्रुओं पर कभी नाव पर,
कभी ये कलम रुकती नहीं,
कभी ये कलम चलती नहीं,
कलमकार तुम धैर्य खोना नहीं,
विजय में भी उन्मत्त होना नहीं,
पराजय मिले भी तो रोना नहीं,
कभी ये कलम रुकती नहीं,
कभी ये कलम चलती नहीं,
कभी आपकी महाग्रंथ रचती,
कभी हमारी भी तुच्छ लेखनी
कभी ये कलम रुकती नहीं,
कभी ये कलम चलती नहीं,
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कितने रावण!

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कितने रावण!
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एक रावण था कि जिसके साथ थे शस्त्रास्त्र दिव्य,
एक ये रावण कि जिसकी देह पर हैं चीनी पटाखे,
एक वो दश-रूप लेकर बन गया आतंकवादी,
अपने तन पर लपेटकर बम-ग्रेनेड विस्फोटक,
करता बाज़ारों चौराहों पर स्टेशनों पर भीड़ में,
विस्फोट, खुद को उड़ाता फ़िरदौस की उम्मीद में !
एक वह जल रहा खड़ा बन्धु-सुत के साथ में,
और जो सारे कि उत्सव मनाते उन्माद में,
बस यहाँ रावण ही रावण हर तरफ़ आते नज़र,
आज कोई राम अब आता नहीं कहीं नज़र!
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September 26, 2017

दो कविताएँ १ ’कुछ भी!’ २. सारांश

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दो कविताएँ
१ ’कुछ भी!’
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इनी-हंसा* की कहानी चैनल,
नई फिर से बनाओ ना!
इनी-हंसा कौन थी / है,
फिर से सबको बताओ ना!
इन्हें हँसना है या रोना है,
शिकायत है या है तारीफ़,
ये दर्शक समझ नहीं पाते,
ज़रा तुम ही समझाओ ना!
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२. सारांश
हवाएँ बहा ले जाएँगीं पानी,
पानी बहा ले जाएँगे रेत,
रेत बहा ले जाएगी वे नाम,
जो लिखे थे हमने तुमने,
लौट जाएँगी लहरें लेकिन,
हवाओं को करने परेशान,
हवाएँ ढूँढती रहेंगी हमको,
उनमें जो मिट चुके हैं नाम !
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*हनी-इंसान

September 23, 2017

’कुछ भी!’ दो शून्य एक साथ! 23/09/2017

दो  कविताएँ
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1. ’कुछ भी!’
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यह फूल खिला ये रंग उड़े,
आकर्षित तितली भृंग उड़े,
सुरभि-संदेसे फैले चहुँ ओर,
झोंके-समीर अनंग उड़े।
उमड़ी कल्पना भावना भी,
हम बहकर उनके संग उड़े,
सपने कौतूहल के सारे,
खुलकर बिखरे वे रंग उड़े ।
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2. लिखना / समझना
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मैं बाबा लिखूँगा,
तुम प्रणाम समझ लेना,
मैं माँ लिखूँगा,
तुम स्नेह समझ लेना,
मैं पानी लिखूँगा,
तुम प्यास समझ लेना,
मैं गीत लिखूँगा,
तुम प्रीत समझ लेना ...!
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September 21, 2017

बुद्धिजीवी प्रवंचनाएँ और विवंचनाएँ

धोखे का अर्थशास्त्र
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बुद्धिजीवी प्रवंचनाएँ और विवंचनाएँ  धोखे के अर्थशास्त्र के मूल सिद्धान्त हैं ।
’मनुष्य को धोखे से सावधान रहना चाहिए और मीठी-मीठी बातों से धोखा न खाते हुए विवेक को जगाए रखना चाहिए।’
बात तो सुलझी हुई थी लेकिन यह समझना कुछ कठिन लग रहा था कि विवेक किस चिड़िया का नाम हो सकता है, जो अपनी मरज़ी से जहाँ चाहे बेरोकटोक पर मार सकती है! पहेली और मुश्किल हो गई थी ।
कोई चाहे तो धोखा देने से शायद खुद को रोक सकता है, लेकिन धोखा खाने से कोई किसी को या खुद को भी कैसे रोक सकता है?
जब तक किसी प्रकार का डर या लालच, किसी ऐसी वस्तु का आकर्षण मन में है, जिसकी हमें क़तई ज़रूरत नहीं लेकिन हम उस डर, लालच, या आकर्षण के वशीभूत होकर उसे पाने की आशा अभिलाषा रखते हैं और यह देखने से बचते रहते हैं कि जिन लोगों के पास वह वस्तु है उनके इस बारे में क्या अनुभव हैं, तब तक क्या हम स्वयं ही स्वयं को धोखा नहीं दे रहे होते? क्या हम स्वयं ही धोखे को आमंत्रित नहीं कर रहे होते?
’ट्रान्स्पेरेन्सी’ / transparency कितनी भी साफ़ क्यों न हो, एक दीवार ही तो होती है,  जिसे ट्रान्सपायरेसी trans-piracy कहना ज़्यादा ठीक है ।
हम ठीक से छान-बीन करें तो क्या हमारे सारे ’संबंध’ हमारी मान्यताएँ ही नहीं होते? मेरी पत्नी मुझे धोखा नहीं देगी, मैं अपनी पत्नी को धोखा नहीं दूँगा... यह बात कितनी भी दृढ़ता से ज़ोर देकर कही जाए, हमारा मन ही जानता है कि यह मनुष्य के लिए नितांत असंभव है कि परिस्थितियों के किन्हीं नाज़ुक क्षणों में हम फ़िसल न जाएँ, और जब हमारा पूरा ’मीडिया’ हमें यह सोचने पर बाध्य करता हो कि मनुष्य की ’निजता’ / स्वतंत्रता कितनी महत्वपूर्ण है, तब हम क्या और अधिक पाखंडी नहीं हो जाते? तब हम किसे धोखा दे रहे होते हैं? क्या ’विवाह’ की क़ानूनी बुनियाद शक और ’नैतिकता’ की परिभाषाओं और मान्यताओं की व्याख्या पर ही नहीं अवलंबित है? क्या यह कोई सीधी सरल पटरी है जिस पर मन का इंजन धड़धड़ाते हुए सरपट दौड़ता जाए? अधिक मुमकिन तो बेशक यही है कि वह कहीं न कहीं रपट ही जाए । तो क्या हम अनैतिक हो जाएँ ? सवाल यह नहीं है कि हमें नैतिक या अनैतिक होना है, सवाल यह है कि क्या हम पहले ही से नैतिक या अनैतिक नहीं हैं ? किसी भी धर्म के अनुयायी के लिए यह कठिन है कि वह उसके अपने धर्म द्वारा दी गई शिक्षाओं का अक्षरशः पालन कर सके । क्या यह धर्म को धोखा देना नहीं हुआ? क्या ऐसे धर्म के अनुयायी बने रहने का दिखावा भी समाज को दिया जानेवाला धोखा नहीं है?
तथ्य तो यह है कि मन नामक वस्तु से समाज का सामञ्जस्य  कैसे स्थापित करे इसे मनुष्य नहीं समझ पाया । राजनीति और परंपराएँ इस समस्या को और जटिल बना देती हैं । ’परिवार’ और ’विवाह’ दोनों मनुष्य की बनाई कृत्रिम व्यवस्थाएँ हैं जो डर, लालच, आशा, सुरक्षा, नैतिकता जैसे काल्पनिक तत्वों पर अवलंबित हैं इसे समझते ही यह स्पष्ट हो जाता है कि क्यों ’लव-मैरिज’ या ’अरेंज़्ड-मैरिज’ भी अन्ततः तलाक़ की हद तक जाते हैं और क्यों मनुष्य, स्त्री हो या पुरुष इस यातना से गुज़रने के लिए बाध्य हैं । डर, लालच, आशा, सुरक्षा, ही मनुष्य को आर्थिक रूप से असुरक्षित बनाते हैं जबकि वह सोचता है कि बहुत संपत्ति, धन-दौलत होने पर वह ’अधिक’ सुरक्षित होगा । बहुत समृद्ध परिवारों में भी पारिवारिक विघटन देखा जाता है, और बहुत गरीब परिवारों में भी ।
क्या संबंधमात्र ’वैचारिक’ मानसिक अवस्था नहीं होता? या, क्या वह कोई भौतिक वस्तु है जिसका भौतिक सत्यापन किया जा सके?
’अब हमारे संबंध समाप्त हो चुके हैं ...’
’संबंध’ समाप्त होते हैं, या ’संबंधित होने की भावना’?
क्या समाप्त होता है?
क्या यह भावना कोई ऐसी वस्तु है, जिसकी सत्यता किसी उपलब्ध कसौटी पर साबित की जा सके?
जब तक कोई स्वयं ही न चाहे, कौन किसे धोखा दे सकता है?
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September 16, 2017

जब कविता बक़वास होती है ...

जब कविता बक़वास होती है
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एक पैग हो जाने के बाद ही,
महफ़िल में उस पर नज़र जा पाती है ।
चौंकानेवाली कुटिल कल्पना से प्रेरित,
किसी आदर्श के प्रति समर्पित,
किसी राजनीतिक ’सरोक़ार’ से ’प्रतिबद्ध’
किसी ’सामाजिक’ दायित्व की पैरोकार,
ब्ल्यू-व्हेल सी, कृपा-कटाक्ष से देखती हुई,
भोली नाज़ुक विषकन्या सी कविता,
आकर्षित कर,
दूर हटा देती है मनुष्य का ध्यान,
अस्तित्व के बुनियादी सवालों से,
और अपनी कृत्रिम सुंदरता के,
मारक अंदाज़ से क्षण भर में ही,
बाल-बुद्धि, अपरिपक्व मानस को,
जकड़ लेती है अपने मोहपाश में,
उस मकड़ी की तरह,
जिसके जाल के अदृश्य तंतु,
फैले हैं दिग्-दिगंत तक !
चूसती रहती है रक्त,
जाल में फँसते कीड़ों का ...
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September 15, 2017

काव्य : कविता और शायरी,

कविता और शायरी
--
कविता लिखी जाती है,
शेर पढ़ा जाता है,
लिखे जाने से पहले,
कविता प्रस्फुटित होती है,
पढ़े जाने से पहले,
शेर उछलता है,
उमंग और उल्लास से!
कविता जब प्रस्फुटित होती है,
तो किसी भाषा में नहीं होती,
बस भाव और भावना होती है ।
लेकिन भाषा का सहारा लेते ही,
कोई विशिष्ट रूप ले लेती है,
एक ही भावना और भावना,
अलग-अलग कवि-मन में,
अलग-अलग भाषाओं में,
असंख्य रूप लेती है ।
शेर जब उछलता है,
तो संतुलित होता है,
वज़न को तौलते हुए,
करता है आक्रमण,
अहिंसक, भव्य, स्तब्धकारी,
इसलिए लिखें या पढ़ें,
यह किसी के बस में नहीं,
वे अपनी भंगिमा और मुद्रा,
स्वयं ही तय करते हैं ।
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September 14, 2017

आज की कविता : मयूर और मेघ

आज की कविता : मयूर और मेघ
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हर एक मयूरपंख में,
एक आँख होती है,
सहस्र नेत्रों से देखता है मयूर,
हर मेघ में छिपी सहस्त्र बूँदों को,
हर आँख में एक पुतली होती है,
जैसे कि आँख का हृदय,
गहन, चमकीला, श्यामल,
और उसके चारों ओर हल्का नील,
हरा होता हुआ आकाश,
आकाश से परे,
पृथ्वी के भूरे होते हुए गेरूए रंग,
जिनसे परे,
अरण्य का विस्तार असीमित,
कविता जब जन्मती है,
ऐसे ही किसी केन्द्र से,
जो अरण्य होता है,
जो पृथ्वी होता है,
जो हृदय होता है,
जो आकाश होता है,
जो आँख होता है,
जो नेत्र और हृदय होता है ।
एक ही नेत्र सहस्र होता है,
और मयूर सहस्रनेत्र !
क्या मयूर का होना कविता नहीं है?
क्या ज़रूरी है इसे लिखना?
क्या ज़रूरी है इसे समझना?
क्या अबूझ को समझा जा सकता है?
तो फिर लिखा जाना भी कैसे हो सकता है?
फिर भी कविता लिखी तो जाती ही है,
न भी लिखी जाये तो भी होती तो है ही,
मेघों के छत्र के तले,
अपने छत्र में नाचता मयूर!
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यह हिन्दी-दिवस !

यह हिन्दी-दिवस !
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मुझे हिन्दी मातृभाषा की तरह मिली थी।  स्कूल में हिन्दी माध्यम से पढ़ा, लेकिन अंग्रेज़ी से मुझे न तो वैर था न लगाव। कक्षा नौ में अंग्रेज़ी-विरोध के कारण हमने तय किया कि अंग्रेज़ी का 'पेपर' नहीं देंगे, अर्थात् बहिष्कार करेंगे।  दूसरे दिन मैं परीक्षा के समय घर से तो चला लेकिन स्कूल जाने के बजाय इधर-उधर भटकते हुए दो-तीन घंटे बाद घर पहुँचा। पिताश्री ही स्कूल में प्राचार्य थे और उन्हें कल्पना नहीं थी की मैं ऐसा अनुशासनहीन क़दम उठाऊँगा।  डर भी बहुत लग रहा था।  परीक्षा-परिणाम आने पर मेरी रैंक चौथी थी।  मुझे आश्चर्य हुआ।  फिर जब कक्षाध्यापक का ध्यान इस ओर आकर्षित किया गया कि 'अंग्रेज़ी' की परीक्षा देना-न-देना ऐच्छिक था और उसके मार्क्स जोड़े नहीं जा सकते तब उन्होंने इस भूल को सुधारा।
हिन्दी मेरे लिए घर की दाल-रोटी है, माँ के हाथों की बनी !
दूसरी भाषाएँ मौसी के हाथों के बने व्यञ्जन !
वे भी प्रिय हैं उनसे भी द्वेष नहीं, लेकिन हिंदी-दिवस मनाने का ख्याल ही मुझे गले नहीं उतरता!
एक मित्र ने कविता लिखी :
"मैं हिंदी हूँ !
वेंटीलेटर पर जिंदी हूँ। .. ... ..."
हिंदी के प्रति उसकी भावनाओं पर मुझे खुशी है, लेकिन मेरी दृष्टि में किसी भी भाषा का अपना जीवन होता है, वे जन्म लेती हैं, पनपती और फूलती-फलती, फैलती हैं और बहुत लम्बे समय में इतना बदल जाती हैं कि पहचानना मुश्किल हो जाता है।  हिंदी भी इसका अपवाद नहीं है।
बहरहाल मैंने उसे यह उत्तर दिया :
 
एक प्रश्न :
क्षमा चाहता हूँ, तुक मिलाने के लिये  ’जिंदा’ / ’ज़िन्दा’ को ’जिंदी’ / ’ज़िन्दी’ कर देना शायद ज़रूरी हो, पर ऐसा करने पर हिंदी ’जिंदा’ कैसे रहेगी?
क्या यहीं से हिंदी का विरूपण शुरू नहीं हो जाता?
--
यूँ तो आज़ाद परिन्दा हूँ,
लेकिन घायल हूँ, ज़िन्दा हूँ,
तुमने पिंजरे में डाल दिया,
कहते हो मुझको पाल लिया,
तुम जब चाहो प्यासा रक्खो,
भूखा रक्खो या भूल रहो,
याद आए या मन हो तो,
भोजन-पानी तब मुझको दो,
साल में किसी एक दिन तुम,
मना लो मेरा हैप्पी-बड्डे,
देखो घायल या ज़िंदा हूँ,
तो ले जाओ डॉक्टर के पास,
तुम क्या चाहो, मुझे पता है,
तुम्हें चाहिए मान-सम्मान,
तुम्हें चाहिए रुतबा शान,
तुम्हें नहीं मुझसे मतलब,
मैं हूँ नुमाइश का सामान,
बस एक दिन नुमाइश का,
ज़िल्लत के बाक़ी सारे दिन,
अच्छा है जो मैं मर जाऊँ,
ऐसे जीवन से उबर जाऊँ !
--  
        

September 11, 2017

फ़रेब / delusion

फ़रेब / delusion
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आपको वक़्त मिल गया होगा,
कहीं कम-बख़्त मिल गया होगा,
दोस्त दुश्मन से नज़र आए होंगे,
दुश्मनों से आशना हुआ होगा ।
ग़मों में उम्मीदें नज़र आई होंगीं,
चमन सहरा में नज़र आया होगा,
वक़्त ने किया होगा फ़रेब कोई,
ख़िजाँ में बहर नज़र आया होगा !
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आज की कविता : गेय-अगेय संप्रेषणीय

आज की कविता 
गेय-अगेय संप्रेषणीय 

उसे शिकायत थी,
’आज’ की कविता से,
मानों ’आज’ कोई ठोस,
ज्ञेय, मन-बुद्धि-इन्द्रियग्राह्य,
हस्तान्तरणीय, विज्ञानसम्मत,
और सुपरिभाषित तथ्य हो,
कविता काल के पिंजरे में क़ैद,
कोई चिड़िया हो ।
हाँ कविता अवश्य ही,
एक चैतन्य और चिरंतन सत्ता है,
आकार-निराकार होने से स्वतंत्र,
और इसलिए कितने ही रूपों में,
अभिव्यक्त होती रहती हो,
उसकी सुचारु संरचना,
सुघड़ता, कितने ही आयामों में,
स्वर-क्रमों में निबद्ध होती हो,
निश्छल, छलशून्य होती है,
जिसे आप रच सकते हैं,आज की कविता
अपनी लय में,
छन्द-मात्रा-संगीत-स्वर-ताल,
की विशिष्ट मर्यादाओं में रहते हुए,
या उन अनभिज्ञ होते हुए भी ।
वह सदा गेय हो यह ज़रूरी नहीं,
जैसे भोर में चहचहानेवाली चिड़िया,
जिसके सुर कभी कर्कश, कभी मधुर,
कभी उदास, कभी आतुर,
कभी प्रसन्न, आर्द्र या शुष्क होते हैं,
चिर नूतन, चिर श्रव्य ।
--

September 10, 2017

बहस करें या बस?

बहस करें या बस?
--
धी अर्थात् ध् + ई, जो विशेष प्रयोजन के लिए बुद्धि का पर्याय है ।
धी जहाँ निधि, अवधि, विधि, शेवधि (तिजोरी) के रूप में स्थिरता की द्योतक है, वहीं बुद्धि अपेक्षतया गतिशीलता की, अस्थिरता की भी ।
इसी धी से उत्पन्न हुआ ग्रीक का ’थी’, ’थियो’ theo।
जैसे ’ध’ से धर्म, धर्म से ’थर्म’ therm,
’धी’ से ही ’थी’ theo , ’थियो’ और ’धर्म’ से ’थर्म’/ therm अर्थात् ’ताप’ हुआ ।
 ’धी’ से ही ’थीसिस’,’थीसिस’ से ’ऐन्टी-थीसिस’ और ’सिन्थेसिस’ हुए ।
धी > धिष् > धिषस् से भी थीसिस दृष्टव्य है ।
बहस की व्युत्पत्ति संस्कृत के ’व-ह-स’ से की जा सकती है, वहीं यह उर्दू में अरबी या फ़ारसी से आया ऐसा भी कहा जा सकता है ।
’ऐन्टी’ anti, एक ओर तो ’आन्तरिक’ के अर्थ में प्रयुक्त ’अन्तः’ से आया है, वहीं दूसरी ओर ’अन्त’ करनेवाले अर्थात् विरोधी या विपरीत के अर्थ में भी किया जाने लगा । इसी प्रकार ’ऐन्टी’ का ’अन्ते’ / ante के रूप में भी ’पूर्व’ के अर्थ में प्रयोग होता है ।
यहाँ वद् > वाद > विवाद और संवाद के संदर्भ में ’बहस’ के औचित्य के बारे में देखें ।
वाद का अर्थ है ’मत’ ’वादे-वादे जायते तत्वबोधः’ की उक्ति के अनुसार विभिन्न वाद मिलकर तत्व के निर्णय में सहायक होते हैं ।
किंतु एक विचित्र तथ्य यह भी है कि किसी भी वाद की अपनी सीमाएँ होती हैं इसलिए भिन्न-भिन्न वाद होने पर मतभेद भी हो जाते हैं । किसी प्रकार का पूर्वाग्रह न हो तो मतभेदों को पुनः मिलकर सद्भावना से सुलझाया जा सकता है, किंतु पूर्वाग्रह होने की स्थिति में यह असंभव हो जाता है । क्योंकि पूर्वाग्रह कोई मान्यता होता है । क्या बिना किसी मान्यता के कोई मत हो यह संभव है? जब हम ईश्वर या जीवन जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं तो इनके अभिप्राय के बारे में हममें उतनी ही स्पष्टता होती है जितनी हममें तब होती है जब हम धरती, आकाश, मनुष्य, भूख, प्यास, डर, नींद, और सोने-जागने आदि जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं । क्या तब इन वस्तुओं, घटनाओं या स्थितियों के बारे में हममें कोई मान्यता या मतभेद होते हैं? स्पष्ट है कि न हममें इनके बारे में कोई ’मान्यता’ होती है, (और इसलिए) न कोई पूर्वाग्रह होता है ।
किंतु जब किसी कार्य को किए जाने का प्रश्न होता है तब उसे कैसे किया जाए उसके औचित्य और अनौचित्य तथा उसके परिणाम आदि पर हममें प्रायः कोई न कोई आग्रह अवश्य होते हैं । इन आग्रहों के बारे में यदि परस्पर मिलकर विचार-विमर्श किया जाए तो संभवतः किसी एक निर्णय पर सहमत हुआ जा सकता है ।
इस प्रक्रिया को थीसिस-ऐन्टीथीसिस-सिन्थेसिस thesis-antithesis-synthesis कहा जा सकता है ।
यदि बहस इस प्रकार की गतिविधि है तो वाद-विवाद-संवाद का यह प्रकार थीसिस-ऐन्टीथीसिस-सिन्थेसिस thesis-antithesis-synthesis कहा जा सकता है । तब बहस की उपयोगिता पर प्रश्न नहीं उठाये जा सकते ।
बहस बस वहीं तक होनी चाहिए।
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भीड़ में अकेला आदमी

आज की कविता
--
भीड़,
कितनी भी अनुशासित क्यों न हो,
अराजक और दिशाहीन होती है ।
भीड़ की संवेदनाएँ तो होती हैं,
भीड़ में समवेदनाएँ कम होती हैं,
भीड़ का कोई तंत्र नहीं होता,
भले ही भीड़ का नाम,
’देश’, ’राष्ट्र’ ’वाद’,’संस्कृति’,
’समाज’, ’समुदाय’ ’भाषा’,
'संस्था', 'सरकार', प्र-शासन,  
'दल', 'वर्ग' या ’धर्म’
'मज़हब' 'रिलीजन',
'रूढ़ि', 'ट्रेडिशन'  क्यों न हो।
अकेला आदमी भीड़ के लिए,
कुछ नहीं कर सकता ।
इससे भी बड़ा सच यह है;
कि भीड़ भी अपने लिए,
कुछ नहीं कर सकती ।
हाँ अपना सर्वनाश,
अवश्य कर सकती है,
लेकिन वह तो वैसे भी,
उसकी नियति है ।
इसलिए वह उससे,
बच भी नहीं सकती ।
और भीड़ है सिर्फ़,
अकेले आदमियों का समूह!
... तो हम क्या कह रहे थे?
--

September 08, 2017

हाथी और चीटियाँ

आज की कविता
हाथी और चीटियाँ
--
हाथी बहुत समझदार तो होते ही हैं,
उनकी याददाश्त भी तेज होती है ।
फ़ूँक-फ़ूँक डर-डर कर क़दम रखते हैं,
कहीं चीटियाँ, दबकर मर न जाएँ!
--

इरमा !

आज की कविता
--
इरमा !
नाम कितना सुन्दर लगता है न!
इरा और रमा का पर्याय,
इरा जो रमा है,
रमा, जो इरा है,
इरा ऐरावत सी,
इरावती सी,
ऐरावत,
जो इरा सा,
रमा जो चञ्चल,
अस्थिर,
केवल सुषुप्त हरि के चरण सहलाती,
किंतु वही इरा,
और वही रमा,
जब हो जाती है,
ऐरावत सी निरंकुश,
देती है पहले तो चेतावनी,
पर कर देती है सर्वनाश भी,
यदि उसकी संतान दुष्ट हो,
न करे उसका सम्मान,
हो उठे निरंकुश !
--

September 07, 2017

Russia.

Hi Friends from Russia!!
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Glad to see there are readers of this Hindi Blog-post in Russia.
I think you may perhaps like to check my other 2 following links also.

Swaadhyaaya-Blog,

English-Blog

Regards and Love from India!
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सिलसिला-ए- सियासत

आज की कविता
--
सिलसिला-ए- सियासत
--
अहसास फ़रेब है किसी और का, ख़ुद के लिए,
अहसास तमाशा है ख़ुद का किसी और के लिए,
क़त्ल का मातम तो है, मातम भी एक जश्न तो है,
बना लेते हैं वो, जश्न को मातम, मातम को जश्न ।
किसी का क़त्ल हुआ है, किसी ने क़त्ल किया है,
जब तलक राज़ है पोशीदा मना लेंगे जश्न या मातम,
राज़ खुलने तक तमाशा करेंगे तमाशाई तमाशबीन,
बस यूँ ही चलता रहेगा सिलसिला सियासत का ।
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September 05, 2017

पञ्च-सीलानि pañca-sīlāni

भूमिका 
फ़ेसबुक के मेरे पेज पर 23  अगस्त 2017 को मैंने भूटान-तिब्बत-भारत की सीमा पर डोकलाम में भारतीय और चीनी फ़ौज़ों के युद्ध के लिए तैयार स्थिति में होने पर लिखा था :

पंचशील के सिद्धान्त को तो चीन ने तभी दफ़ना दिया था जब उसने ल्हासा पर अधिकार कर लिया और दलाई लामा को भारत भागने पर मज़बूर कर दिया, जिन्हें भारत ने शरण दी थी ।
आज जब शी जिनपिंग (习近平, Xi Jinping), का यह वक्तव्य पढ़ा कि चीन चाहता है कि वह पंचशील के  मार्गदर्शन में भारत से संबंध सुधारे, तो मुझे याद आया और मेरा यह विश्वास और भी दृढ़ हुआ कि वास्तव में कोई ब्रह्माण्डीय ’बुद्ध-चेतना’ संसार के लिए मार्गदर्शन दे रही है ।
यदि चीन वास्तव में ईमानदारी से इस प्रेरणा पर अमल कर सकता है, तो वह वास्तव में आज भी विश्व-विजेता बन सकता है और पूरी दुनिया के लोगों के दिलों को जीत सकता है लेकिन यदि उसके दिल में कपट है (जैसा कि पिछली सदी छठे दशक में था), तो इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती ।
--
पञ्च-सीलानि
pañca-sīlāni 
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पञ्चशील का सिद्धांत
(मौलिक रूप)
बुद्ध-प्रणीत  
(बौद्ध धर्म के अनुसार) 
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पाणादिपाता वेरमणि
सिक्खापदं समादियामि ...१.
(मैं प्राणियों की हिंसा नहीं करूँगा।)
अदिन्नादाना वेरमणि
सिक्खापदं समादियामि ...२.
(जो मुझे दिया नहीं गया है, उसे मैं (बलपूर्वक) नहीं लूँगा।)
कामेसु मिच्छाचार वेरमणि
सिक्खापदं समादियामि ...३
(मैं व्यभिचार नहीं करूँगा। )
मूसावाद वेरमणि
सिक्खापदं समादियामि ...४
मैं मिथ्याभाषण नहीं करूँगा।)
सुरा-मेरय-मज्जा-पमादट्ठाना वेरमणि
सिक्खापदं समादियामि ...५
मैं ऐसे मादक-द्रव्यों का सेवन नहीं करूँगा जिनसे मेरे चित्त में विकार उत्पन्न हो। ) 
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pañca-sīla -s The Five Precepts of Buddha
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pāṇādipātā verāmaṇi
sikkhāpadaṃ samādiyāmi ...1.
adinnādānā verāmaṇi
sikkhāpadaṃ samādiyāmi ...2.
kāmesu micchācāra verāmaṇi
sikkhāpadaṃ samādiyāmi ...3
mūsāvāda verāmaṇi
sikkhāpadaṃ samādiyāmi ...4
surā-meraya-majjā-pamādaṭṭhānā
sikkhāpadaṃ samādiyāmi ...5
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प्रसंगवश याद आया :
ये जो शहतीर है, पलकों पे उठा लो यारों,
अब कोई ऐसा तरीका भी निकालो यारों
दर्दे-दिल वक़्त पे पैग़ाम भी पहुँचाएगा
इस क़बूतर को ज़रा प्यार से पालो यारों
लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे
आज सैयाद को महफ़िल में बुला लो यारों
आज सीवन को उधेड़ो तो ज़रा देखेंगे,
आज सन्दूक से वो ख़त तो निकलो यारों !
(स्व. दुष्यन्त कुमार)
--

September 03, 2017

मेरा मज़हब

आज की कविता
--
मेरा मज़हब
मुझे किसी से नफ़रत नहीं,
इसलिए मैं ’किसी से नफ़रत मत करो’
का उपदेश या सलाह भी किसी को नहीं देता,
लेकिन अगर मुझे किसी से मुहब्बत नहीं,
तो मैं उससे मुहब्बत होने का नाटक क्यों करूँ?
क्या ऐसी मुहब्बत धोखा देना ही नहीं हुआ?
न सिर्फ़ उसे, बल्कि ख़ुद अपने-आपको भी?
जिसने मुझे बहुत तक़लीफ़ दी,
सिर्फ़ इसलिए जिसे मैं याद भी नहीं करना चाहता,
मैं उससे मुहब्बत होने का नाटक क्यों करूँ?
वैसे तो उससे मुझे नफ़रत कभी थी भी नहीं,
लेकिन उसने मुझे बहुत तक़लीफ़ देकर,
ख़ुद ही अपना दुश्मन बना लिया ।
मुझमें उसके लिए नफ़रत पैदा कर दी,
और जो अब मुझे मुहब्बत का सबक़ सिखा रहा है,
वह यह क्यों भूल जाता है,
कि दूध का जला छाछ भी फ़ूँक-फ़ूँक कर पीता है !
पहले झाँके वह ख़ुद के गरेबान में,
और खोज ले,
कि कोई किसी से नफ़रत क्यों करता है!
तब उसे किसी को,
मुहब्बत का सबक़ सिखाना ज़रूरी न रह जाएगा ।
कोई किसी से नफ़रत न करे यही काफ़ी है,
और न पैदा होने दे, दूसरों के दिलों में नफ़रत,
अगर इतना भी कोई कर सकता है तो,
ज़रूरी नहीं रह जाता मुहब्बत का सबक़ !
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जो अपने ’मज़हब’ को लादता है किसी पर,
ताक़त से, तलवार, प्रचार या धोखे से,
उसका क्या मज़हब है यह तो ज़ाहिर है,
जो मज़हब के नाम पर पैदा करे डर, नफ़रत,
उसका मज़हब से क्या वास्ता यह भी ज़ाहिर है,
और फिर वो ही देने लगे मुहब्बत का सबक़,
मन्दिर, मस्ज़िद, गिरजों के एक होने का सबक़,
उसपे तक़लीफ़ज़दा कोई भरोसा कैसे करे?
हाँ कोई बस, सिर्फ़ तकल्लुफ़ के लिए सुन लेगा ।
इससे दिलों में जमा नफ़रत न कभी कम होगी ।
कोई ऐसा तरीक़ा हो जिससे न हो नफ़रत पैदा,
सिर्फ़ दिखावे के लिए मत दो झूठे मुहब्बत के सबक़ ।
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ये मुहब्बत भी ले लो, ये नफ़रत भी ले लो,
भले छीन लो जात-ओ-मज़हब भी मेरा,
मग़र छोड़ दो मुझको मेरे दिल के हवाले !
न ख्रीस्त, हिन्दू, सिख, न मुसलमान होना !
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September 01, 2017

लीला

आज की कविता
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लीला
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शान्त जल, प्रवाह है ठहरा हुआ,
धरा ने जिसे बाँधकर रोक रखा है,
एक बच्चा फेंकता है एक कंकर,
और वह प्रवाह हो जाता है चंचल,
हर दिशा में भागता है लहर होकर,
लौट आता है पुनः पुनः पर केन्द्र पर,
पुनः पुनः दौड़ता है जल तरंग बन,
और सुर छिड़ जाते हैं जलतरंग के,
हर तरंग का पुनः एक आवर्त अपना,
और हर आवर्त का फिर अपना कंपन,
काँपता है जल तो धरती काँपती है,
काँपता है धरा पर उभरता जीवन,
आवर्त में कितने ग्रह कितने उपग्रह,
कितने सूर्य कितने चन्द्र नक्षत्र-तारे!
खो गया ब्रह्माण्ड के विस्तार में बच्चा,
और फिर चकित सा वह आत्म-विस्मृत,
ठठाकर हँस पड़ता जल, शान्त था जो,
और बच्चा फेंकता है, - एक और कंकर!
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न अर्थ न प्रयोजन,
न समय बिताने के लिए,
क्योंकि समय स्वयं उसका विस्तार है,
जो सिमटता फैलता है,
तरंगों के साथ ।
चकित वह,
अपनी ही सृष्टि से,
खेलता रहता है,
कौतूहलवश,
समय होने तक!
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