November 28, 2015

किंगफ़िशर और मछेरे


दो कविताएँ 
किंगफ़िशर,
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वे मारते हैं पर,
हवा में ।
वे मारते हैं डुबकी,
पानी में ।
पकड़ लाते हैं,
चोंच में ।
साँस लेने के लिए तड़फ़ती,
एक मछली।
और फ़िर दूसरी नाश्ते के बाद,
थोड़ी देर से ।
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मछेरे
वे फ़ैलाते हैं जाल,
पानी में,
समेटते हैं जाल,
हौले-हौले,
पकड़ लाते हैं,
जाल में.
साँस लेने के लिए तड़फ़ती,
बहुत सी मछलियाँ ।
और फ़िर दूसरी,
इन्हें बेचने के बाद ।
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