September 15, 2009

य एषु सुप्तेषु जागर्ति .

य एषु सुप्तेषु जागर्ति

कौन है वह जो 'इन' 'सोये-हुओं' में जागता है?
मैं इस सूक्ति को कुछ अलग अर्थ में देखता हूँ।
सोचता हूँ यह 'किसका' उल्लेख है?
कौन है, जो जागता है, -सोये हुओं के बीच ?
सोये हुए तो,
'-मैं जागता हूँ, ' नहीं कह सकते !
वे तो,
'मैं सो रहा हूँ,'
-ऐसा भी कहाँ कह सकेंगे?
निश्चित ही,
अवश्य ही,
'कोई' है,
जो 'जागृत' है ।
जो 'जानता' है, कि मैं सोया हुआ नहीं हो सकता ।
और 'दूसरे' ही 'सोये' हुए हैं ।
क्या शरीर ?
शरीर अपने स्वाभाविक कर्म में रत है ।
ऋतुओं की तरह ।
न जाने किसकी प्रेरणा से ?
"केन प्रेषितो अयं ?"
वह कुछ भी नहीं कहता,
न यह कि मैं जागता हूँ,
और न यह, कि मैं नहीं जाग रहा ।
बस चुपचाप अपना कार्य करता रहता है ।
फ़िर कौन?
क्या इन्द्रियाँ ?
वे तो मन का अनुगमन करती हैं,
-यंत्रवत ।
मन के जुड़ने से ही उन्हें 'सत्ता' मिलती है ।
हाँ यदि मन उनका दास हो जाए, तो मन उनके स्वरूप का हो जाता है,
-सोया-सोया सा,
-खोया-खोया सा ।
यंत्र ही हो बैठता है वह ।
क्या यंत्र कभी सोते हैं ?
या कभी जागते भी हैं ?
वे तो अपने स्वामी के संकेत से कार्य करने लगते हैं ।
किसी 'जागृत' सत्ता की प्रेरणा से स्फूर्त्त होकर !
किसी जागृत 'सत्ता' द्वारा 'प्राणों' को आंदोलित कर दिए जाने पर !
और,
क्या 'प्राण' भी यंत्रवत ही किसी 'देवता' का सान्निध्य पाने पर ही,
अपना कार्य नहीं करते हैं?
क्या उस 'जागृत' सत्ता को कोई 'सुप्त' कभी देख सकता है ?
'जागृत' अपना प्रमाण आप ही है ।
तो हम कर रहे थे ,
-इन्द्रियों की बात,
वे 'प्राणों' की गति से, और प्राणों को प्रेरित करनेवाले,
उस 'जागृत' या सुप्त मन की संलग्नता से ही अपने-अपने कार्य में प्रवृत्त होती हैं न ?
और 'मन' ?
क्या वह बुद्धि, स्मृति, इच्छा, संकल्प, और,
राग, द्वेष, से ही 'प्रवृत्त' नहीं हुआ करता ?
क्या वे सभी,
-यंत्रवत ही अपना कार्य नहीं करते ?
क्या वे 'जागृत' होते हैं ?
हाँ वे कार्य में संलग्न या उससे विलग्न अवश्य होते रहते हैं ।
क्या उनसे जुड़ा 'मन' सोया हुआ ही नहीं होता ?
किसी 'आदर्श', कल्पना, सुख-दु:ख या 'अवसाद' में,
'स्वप्नों' में डूबा हुआ ?
तो इन सब 'सोये-हुओं' में,
-'कौन' जागता है ?
"मैं" ?
जरूर हर-कोई जानता है,
-जब वह जागता है ,
जरूर हर कोई जागता है,
-जब वह जानता है ।
वह 'कौन' , कौन है ?
जो सदा है,
जो सदा-सर्वदा ही ऐसा है ।
-वह जागता भी अवश्य है ?
जो, सदा ।
जो मुक्त भी तो होता है,
कभी-कभी,
जब 'कोई' 'सो' रहा होता है,
और, जब हम उसे जगाने जाते हैं,
तो वह कहता है, -
'अभी मैं सो रहा हूँ, सोना चाहता हूँ।
जगाओ मत !'
क्या वह झूठ कहता है?
यदि वह झूठ कहता है, तो कैसे कह सकता था ?
यदि वह जाग रहा है, तो कैसे कह सकता था ?
'य एषु सुप्तेषु जागर्ति '
-ऋषि के वचन कितने अद्भुत हैं !
कितने सुंदर !
'य:' कहते ही, ऋषि,
उसे 'जागृत' कर देता है,
'अनावरित', और मुक्त,
'जो' सदा ही ऐसा है ।
- नित्य जागृत है ।
ऋषि,
क: एषु सुप्तेषु जागर्ति ,
स: एषु सुप्तेषु जागर्ति,
या,
अयं एषु सुप्तेषु जागर्ति ,
नहीं कहते !
जागृत चैतन्य को क: , स: की तरह से नहीं पहचाना जा सकता !
क्योंकि तब वह 'अपने ' से ही 'अन्य' हो जाता है !
चैतन्य तो 'अनन्य' होता है,
अहम्-इदं के विभाजन से रहित !
और इसीलिये , उसे स: अथवा अयं के रूप में भी नहीं ग्रहण किया जा सकता ।
य: का प्रयोग कितना सम्यक प्रयोग है !
तस्मै ऋषये नम इदं ।
किंतु यदि जागृत - चैतन्य सोये हुओं में जागता है , तो अवश्य ही वह उन सोये - हुओं से अभिन्न भी होता है ,
क्योंकि 'सोये-हुए' तो स्वयं को भी नहीं प्रमाणित कर सकते !!
कैसे ?
जागृत-आदि त्रयोन्मुक्तम , जागृत-आदि-मयं-स्तथा ,
ओंकारैक सु-संवेद्यो यत्पदं तन्नमाम्यहम !(मांडूक्य-उपनिषद् )
फ़िर ,
तत्-युष्मदोरस्मदि - संप्रतिष्ठा ,
तस्मिन्-विनष्टे -अस्मदि -मूल -बोधात ,
तत्-युष्मदस्मिं -मति वर्जितैका ,
स्थिति: ज्वलन्ती सहजात्मन: स्यात !! (सत् -दर्शनं , श्री रमण महर्षि )


ब्रह्म सजातीय, विजातीय, तथा स्वगत भेदों से रहित है ।
नित्य जागृत चैतन्य , आत्म-तत्त्व, ही इन सोये हुओं में जागता है ।


posted by Vinay Vaidya,


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